80 करोड़ की संपत्ति के मालिक पद्मश्री का वृद्धाश्रम में हुआ देहांत, बेटे-बेटी ने मुंह मोड़ा !😢😢

    


एक पुरानी कहावत है, "पूत कपूत तो का धन संचय, पूत सपूत तो का धन संचय।" यह कहावत आज के आधुनिक युग में एक कड़वी सच्चाई बनकर सामने आ रही है। माता-पिता के प्रति संतान का बढ़ता स्वार्थ और कर्तव्यहीनता, इस कथन को बार-बार प्रमाणित कर रहा है। इसी की एक हृदय विदारक कहानी वाराणसी में देखने को मिली, जहाँ पद्मश्री से सम्मानित आध्यात्मिक साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल का देहांत वृद्धाश्रम में हुआ, और उनके बेटे-बेटी अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हुए।

पद्मश्री से सम्मानित, फिर भी बेसहारा

काशी के एक प्रतिष्ठित नाम, श्रीनाथ खंडेलवाल, जिन्होंने सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखकर साहित्य जगत में अपना अमूल्य योगदान दिया, उन्हें 2023 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वह साहित्यकार होने के साथ-साथ एक महान आध्यात्मिक पुरुष भी थे। उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी है। एक बेटा सफल व्यवसायी है और बेटी सुप्रीम कोर्ट में वकील है। करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने के बावजूद, उनकी संतानों ने उन्हें जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेला छोड़ दिया।

जायदाद हड़पी, और छोड़ दिया बेसहारा

श्रीनाथ खंडेलवाल जी अपना सारा समय साहित्य और अध्यात्म में लगाते थे। इसी का फायदा उठाकर उनकी संतानों ने उनकी सारी जायदाद हड़प ली। इसके बाद, उन्हें बीमार और बेसहारा हालत में सड़क पर छोड़ दिया गया। मानवता की मिसाल पेश करते हुए कुछ समाजसेवियों ने उन्हें काशी कुष्ठ वृद्धाश्रम पहुँचाया, जहाँ उनकी निःशुल्क सेवा हुई। वृद्धाश्रम में रहते हुए वे खुश थे, लेकिन उनके अपने ही बच्चों ने कभी उनका हाल जानने की कोशिश नहीं की।

चंदा इकट्ठा कर किया गया अंतिम संस्कार

वृद्धाश्रम में ही श्रीनाथ खंडेलवाल जी का स्वास्थ्य बिगड़ा, और उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया। अंततः, 80 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। दुख की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब उनके बच्चों को उनके देहांत की सूचना दी गई। व्यस्तता का हवाला देकर बेटों ने अंतिम दर्शन से इनकार कर दिया, और बेटी ने भी अपना मुंह मोड़ लिया।

यह देखकर समाजसेवक अमन ने चंदा इकट्ठा किया और पूरे विधि-विधान के साथ श्रीनाथ खंडेलवाल जी का अंतिम संस्कार किया।

यह घटना न केवल एक व्यक्ति की त्रासदी है, बल्कि हमारे समाज के मूल्यों में आ रही गिरावट का एक दर्दनाक प्रमाण भी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या धन और स्वार्थ का मोह इतना गहरा हो गया है कि रिश्तों की पवित्रता भी उसके सामने फीकी पड़ गई है?


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