सैन्य पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही!

   कोटि कोटि नमन! 


 यह विलंबित सम्मान, युद्ध के दौरान परिचालन गोपनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच के नाजुक संतुलन पर सरकार की अविश्वशनीयता  है।  कैसे एक सरकार 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का नाम लेकर अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए तथ्यों को छुपाई है। 

​पारदर्शिता का अभाव और राजनीतिक नैरेटिव:  सरकार ने 'ऑपरेशन सिंदूर' (2025) के दौरान मारे गए छह सैनिकों के बलिदान को स्वीकार करने में एक साल से अधिक का समय लिया। यह देरी सरकार की उस "अतिशयोक्तिपूर्ण आत्म-प्रशंसा" वाली रणनीति के विपरीत है, जो वह सार्वजनिक रूप से अपनाती रही।

​संसद को गुमराह करना: कैसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जुलाई 2025 में लोकसभा में दावा किया कि "कोई भारतीय सैनिक हताहत नहीं हुआ"। सरकार द्वारा बाद में इसे "संदर्भ" के नाम पर स्पष्ट करने का प्रयास, उसकी विश्वसनीयता को और कम करता है।

​गोपनीयता बनाम जवाबदेही:  सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि 'परिचालन गोपनीयता' और 'सार्वजनिक जवाबदेही' में अंतर होता है। युद्ध में होने वाली हताहतों को छिपाना शायद सरकार के राजनीतिक हितों की रक्षा कर सकता है, लेकिन यह निश्चित रूप से 'राष्ट्रीय हित' में नहीं है।

​बलिदान का अपमान: सैनिकों के बलिदान को तुरंत मान्यता न देना न केवल एक रणनीतिक चूक है, बल्कि उन सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति एक बड़ा अनादर भी है जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

लोकतंत्र में, जनता हमेशा सरकार की कार्रवाइयों की कीमत चुकाती है, चाहे वह आर्थिक हो या मानवीय। इसलिए, लाभ और हानि की सार्वजनिक रूप से जवाबदेही तय करना ही भविष्य में "समझदारीपूर्ण निर्णय लेने"  का एकमात्र तरीका है। 

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