भारतीय अर्थव्यवस्था का खोखला होता आधार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
भारतीय अर्थव्यवस्था की चमक-दमक वाली 'विकास गाथा' के पीछे छिपी कड़वी सच्चाइयों को उजागर है। यह स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में सरकार का ध्यान ठोस आर्थिक सुधारों के बजाय केवल नैरेटिव बनाने पर केंद्रित रहा है।
आयात पर खतरनाक निर्भरता: ऊर्जा, खाद और तकनीक के लिए देश का भारी आयात पर निर्भर होना अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाता है।
कमजोर होती सामाजिक सुरक्षा: मनरेगा जैसे सुरक्षा जाल को कमजोर करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम नागरिक गहरे संकट में हैं।
नवाचार और विनिर्माण का अभाव: देश का 'विश्र्वगुरु' बनने का दावा तकनीकी नवाचार के अभाव में खोखला है। हम आज भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे सेमीकंडक्टर और उन्नत विनिर्माण, में पिछड़ रहे हैं।
ध्यान भटकाने वाली राजनीति: जनमानस का ध्यान बेरोजगारी और गिरती आय जैसे वास्तविक मुद्दों से हटाकर सांप्रदायिक और विभाजनकारी विवादों में उलझाया जा रहा है, जो विकास की नींव को ही खोखला कर रहा है।
समय की मांग है कि सरकार छद्म नैरेटिव छोड़ कर वास्तविक आर्थिक प्राथमिकताओं पर ध्यान दे। यदि अब भी सुधार नहीं किए गए, तो आर्थिक संकट और सामाजिक अस्थिरता का खतरा और गहरा जाएगा।

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