अपराध का प्रदर्शन और मीडिया की जिम्मेदारी!

   


​वर्तमान डिजिटल युग में अपराध केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक 'तमाशा' बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने 'नकल के अपराध' (कॉपीकैट क्राइम) की गंभीर अवधारणा को रेखांकित किया है। अक्सर देखा गया है कि सामूहिक हिंसा, सार्वजनिक स्थानों पर हमले, आत्महत्या या आतंकी घटनाओं को दोहराने की कोशिश की जाती है, जो समाज के लिए एक बड़ा खतरा है।

​मीडिया और 'नैतिक दहशत' 

​समाजशास्त्री स्टैनली कोहेन के सिद्धांतों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि कभी-कभी मीडिया और सार्वजनिक विमर्श किसी सामाजिक समस्या को इतनी अधिक महत्ता दे देते हैं कि वह सामूहिक अवचेतन में एक असामान्य और भयावह स्थिति पैदा कर देता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में, अपराध का नाटकीय चित्रण अब किसी साधारण नाटक जैसा नहीं रहा; इसमें अपराध का भय कम और उसकी 'भव्यता' का प्रदर्शन अधिक होने लगा है।

​मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि अपराध की तकनीकी जानकारी को सीमित रखा जाना चाहिए। समाज की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि:

​अपराध की सूचनाओं को केवल जानकारी तक ही सीमित रखा जाए।

​अपराध की प्रस्तुति को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि  प्रस्तोता यह तय नहीं कर सकता कि उसकी सामग्री का जनता पर कैसा प्रभाव पड़ेगा।

​अपराध समाज की सबसे जटिल अवधारणा है, इसलिए इसे मीम और चुटकुलों जैसी सतही चीजों से दूर रखना ही समाज के स्वास्थ्य के लिए हितकर है।

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