भारत की खाद्य प्रणाली को जलवायु-सुरक्षित बनाना अत्यंत आवश्यक ।
1960 के दशक के खाद्य संकट से उबरकर 80 करोड़ से अधिक लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने वाला भारत अब जलवायु परिवर्तन (अत्यधिक तापमान, अनिश्चित मानसून, बाढ़ और सूखा) के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। अब चुनौती केवल "खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने" तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (बीज, खरीद, भंडारण, परिवहन और पोषण) को जलवायु-अनुकूल बनाना समय की सबसे बड़ी मांग है।
भारत ने कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव किया है। वर्ष 2024-25 में देश ने 350 मिलियन टन से अधिक रिकॉर्ड अनाज उत्पादन हासिल किया। 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम' और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' जैसी पहलों के माध्यम से लगभग 80 करोड़ आबादी को रियायती दर पर भोजन मिल रहा है।
बढ़ते तापमान, बार-बार आने वाले सूखे व बाढ़ और भूजल स्तर में गिरावट के कारण 1.4 अरब लोगों के लिए किफायती और पौष्टिक भोजन की निरंतर उपलब्धता पर संकट मंडरा रहा है।
गेहूं-चावल चक्र की सीमाएं: वर्तमान खरीद प्रणाली मुख्यतः कुछ ही फसलों और क्षेत्रों तक सीमित है, जिससे पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों में गंभीर जल संकट पैदा हो गया है।
केवल गेहूं-चावल पर निर्भर रहने के बजाय बाजरा , दालें और तिलहन जैसी स्थानीय जलवायु-अनुकूल फसलों की खरीद बढ़ानी होगी। इससे जल संरक्षण के साथ-साथ न्यूट्रिशन सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
कोल्ड-चेन एवं भंडारण: अत्यधिक गर्मी और प्राकृतिक आपदाओं से खाद्यान्न और जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं को बचाने के लिए बाढ़-रोधी गोदामों और व्यापक कोल्ड-चेन नेटवर्क का विकास आवश्यक है।
मौसम विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों को सीधे कृषि सलाह, सूक्ष्म सिंचाई डिजिटल उपकरणों और फसल बीमा से जोड़ना होगा।
खाद्य सुरक्षा' से 'सतत खाद्य सुरक्षा' हो।
ग्रीन बॉन्ड्स, फसल बीमा और अनुकूलन वित्त के माध्यम से कृषि मूल्य श्रृंखला में निवेश बढ़ाना।
जलवायु जोखिम को बाद में प्रबंधित की जाने वाली समस्या मानने के बजाय नीति निर्माण और NFSA योजना के प्राथमिक मानदंड के रूप में शामिल करना होगा।
भारत के पास पहले से ही मजबूत संस्थागत ढांचा और प्रशासनिक दक्षता मौजूद है। पारंपरिक बफर स्टॉक के विचार को 'क्लाइमेट बफर' में बदलकर, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में विविधता लाकर और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर भारत न केवल अपनी खाद्य प्रणाली को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर सतत कृषि का एक सशक्त उदाहरण पेश कर सकता है।

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