लोकसभा सीटों की संख्या 543 ही रहनी चाहिए!
संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद, 2027 में होने वाले संभावित परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा सीटों के विस्तार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्य प्रश्न यह उठता है: क्या परिसीमन का अर्थ आवश्यक रूप से लोकसभा के आकार को बढ़ाना ही है?
पहली नज़र में लगता है कि 1971 के बाद से भारत की आबादी में अत्यधिक वृद्धि हुई है, इसलिए लोकसभा सीटों में भी आनुपातिक बढ़ोतरी होनी चाहिए।
हालांकि, संविधान का अनुच्छेद 81 प्रतिनिधित्व की बात करता है और अनुच्छेद 82 परिसीमन का प्रावधान करता है, लेकिन संसद ने 1976 (42वें संशोधन) और 2002 (84वें संशोधन) में सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना पर फ्रीज (स्थगित) कर दिया था।
इसका मुख्य उद्देश्य उन राज्यों (विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों) को राजनीतिक रूप से दंडित होने से बचाना था, जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति को सफलता से लागू किया।
सरकार द्वारा सुझाव दिया गया है कि सभी राज्यों की सीटों में 50% की समान वृद्धि कर दी जाए ताकि उनका आनुपातिक अनुपात बना रहे (उदा. उत्तर प्रदेश 80 से 120, तमिलनाडु 39 से 59)।
अनुपात भले ही समान रहे, लेकिन सीटों का वास्तविक अंतर 41 सीटों से बढ़कर 61 सीटों का हो जाएगा। संसद में कानून और सरकारें बहुमत के वास्तविक आंकड़ों से बनती हैं, अनुपातों से नहीं। यह वृद्धि उन राज्यों के साथ अन्याय होगी जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर कार्य किया।
परिसीमन का अर्थ केवल सीटें बढ़ाना नहीं होता। 2001 की जनगणना के बाद राज्यों के भीतर सीटों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया था, बिना राज्य की कुल सीटों की संख्या बदले।
अमेरिका (USA): 1913 से प्रतिनिधि सभा की सीटें 435 पर ही स्थिर हैं, भले ही आबादी बहुगुणा बढ़ चुकी है।
स्विट्जरलैंड: 1963 से 200 सदस्यों पर स्थिर है।
इटली - इन्होंने संसदीय दक्षता बढ़ाने के लिए अपने सदनों का आकार छोटा किया है।
800 से अधिक सदस्यों वाली लोकसभा में सांसदों को अपनी बात रखने और बहस करने का समय और कम मिलेगा, जिससे संसदीय लोकतंत्र कमजोर होगा।
नागरिकों की दैनिक समस्याओं (सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा) का मुख्य संबंध राज्य स्तर (विधानसभा) से होता है। यदि जनप्रतिनिधियों की पहुंच बढ़ानी है, तो विधानसभा की सीटों को बढ़ाया जा सकता है, न कि लोकसभा को।
महिला आरक्षण (33%) को लोकसभा का आकार बढ़ाने के औचित्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 543 सीटों के मौजूदा ढांचे के भीतर भी महिलाओं के लिए लगभग 181 सीटें आरक्षित की जा सकती हैं। महिला प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन दोनों को एक साथ हासिल किया जा सकता है।
लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 ही रखी जाए।
राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा आवंटन (1971 के आधार पर) बरकरार रखा जाए।
राज्यों के भीतर आंतरिक जनसंख्या संतुलन के लिए सीमा-पुनर्निर्धारण (परिसीमन) किया जाए।
543 सीटों में ही 33% महिला आरक्षण लागू किया जाए।
जनप्रतिनिधियों की नागरिक पहुंच बढ़ाने के लिए विधानसभाओं की सीटों का विस्तार किया जाए।

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