क्या अभियुक्त को एफआईआर की प्रति देने से इनकार किया जा सकता है?

 



 

कानूनी प्रावधान, न्यायपालिका का रुख और अभियुक्त के अधिकारों का एक सारगर्भित विश्लेषण

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया कि वे स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर  और सीसीटीवी फुटेज की प्रति प्रदान करें। पत्रकार का आरोप था कि अयोध्या में राम मंदिर दान में हुई कथित अनियमितताओं पर रिपोर्टिंग करने के कारण उन्हें गलत मामले में फंसाया गया था। बार-बार मांगने के बावजूद पुलिस ने उन्हें एफआईआर की प्रति नहीं दी थी, जिसके बाद उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा।

. वैधानिक प्रावधान क्या कहते हैं? (BNSS के तहत स्थिति)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में एफआईआर दर्ज होते ही तुरंत अभियुक्त को उसकी प्रति देने का कोई स्पष्ट बाध्यकारी प्रावधान नहीं है:

धारा 173(2): यह सूचनाकर्ता या पीड़ित (Victim) को तुरंत और नि:शुल्क एफआईआर की प्रति देने का प्रावधान करती है, लेकिन इसमें अभियुक्त (Accused) का उल्लेख नहीं है।

धारा 230: इसके अनुसार मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप-पत्र दाखिल होने के बाद (14 दिनों के भीतर) ही अभियुक्त को एफआईआर और संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां सौंपी जाती हैं।

कानून के शाब्दिक पाठ के अनुसार जांच प्रक्रिया के दौरान शुरुआती चरण में अभियुक्त को सीधे एफआईआर देने की स्पष्ट कानूनी बाध्यता दर्ज नहीं है।

. अदालतों के ऐतिहासिक निर्णय एवं न्यायशास्त्र

कानूनी संहिता में रिक्ति के बावजूद न्यायपालिका ने विभिन्न फैसलों के जरिए अभियुक्त के एफआईआर प्राप्त करने के अधिकार को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की है:

अजय चौधरी बनाम राज्य (दिल्ली उच्च न्यायालय, 2010): अदालत ने व्यवस्था दी कि अभियुक्त जांच के दौरान भी एफआईआर प्राप्त कर सकता है और पुलिस को 24 घंटे के भीतर एफआईआर वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया।

रामा नंद राठौर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2014): हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि जिस व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी की आशंका हो, वह पुलिस से 24 घंटे में प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकता है।

यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट, 2016): सर्वोच्च न्यायालय ने देशव्यापी निर्देश जारी करते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे (भौगोलिक या तकनीकी बाधाओं में 48 से 72 घंटे) के भीतर पुलिस या राज्य सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से अपलोड की जानी चाहिए।

 'संवेदनशील मामलों' (Sensitive Offences) में छूट

अदालतों ने एफआईआर की सार्वजनिक उपलब्धता में कुछ अपवाद भी निर्धारित किए हैं:

छूट की श्रेणी: यौन अपराध, पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामले, बाल अपराध और आतंकवाद व राज्य की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की एफआईआर सार्वजनिक नहीं की जाती।

निर्णय प्रक्रिया: एफआईआर की जानकारी रोकने का फैसला पुलिस उपाधीक्षक (DySP/ACP) या उससे उच्च स्तर के अधिकारी द्वारा कारण दर्ज करके ही लिया जा सकता है।

उपचार (Remedy): यदि किसी अभियुक्त की एफआईआर रोकी जाती है, तो वह या उसका अधिकृत प्रतिनिधि संबंधित मजिस्ट्रेट से आवेदन कर 3 दिनों के भीतर उसकी प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकता है।

. एफआईआर की समयबद्ध प्रति क्यों आवश्यक है? 

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, एफआईआर तक समय पर पहुंच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और निष्पक्ष विचारण का मूल आधार है।

यदि अभियुक्त को एफआईआर की प्रति नहीं मिलती, तो:

वह अग्रिम जमानत  के लिए आवेदन नहीं कर सकता।

वह फर्जी या दुर्भावनापूर्ण मामलों को रद्द (Quashing of FIR) कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर नहीं कर सकता।

उसे अपने खिलाफ लगे कानूनी आरोपों और धाराओं की जानकारी ही नहीं मिल पाती, जिससे उसका कानूनी बचाव पक्ष शुरुआत में ही पंगु हो जाता है।


यद्यपि आपराधिक न्याय संहिता (BNSS) में जांच के शुरुआती चरण में अभियुक्त को एफआईआर देने का सीधा उल्लेख नहीं है, किंतु उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक आदेशों के तहत प्रत्येक अभियुक्त को 24 घंटे के भीतर एफआईआर की प्रति पाने या वेबसाइट के माध्यम से उस तक पहुंचने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। एफआईआर छिपाना या देने से मना करना अभियुक्त के अधिकारों का हनन है।







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