कवि शैलेन्द्र: संवेदनशीलता, संघर्ष और स्वाभिमान का नाम !
वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे।
मशहूर गीतकार शैलेन्द्र की लेखनी में साधारण इंसान की पीड़ा, गरीबी का दर्द और व्यवस्था के खिलाफ एक खामोश बगावत साफ झलकती है। रेलवे की नौकरी से लेकर सिनेमा के सुनहरे दौर तक, उनके गीत आम आदमी की आवाज़ बने।
संघर्ष और अनछुए पहलू
भूख और बीड़ी का दौर: अपने शुरुआती दिनों में जब उनके पास भरपेट खाने के पैसे नहीं होते थे, तब वे भूख के अहसास को दबाने के लिए बीड़ी पिया करते थे। यह तंगहाली उनके गीतों में दर्द और सच्चाई बनकर उतरी।
स्वाभिमानी स्वभाव: शैलेन्द्र ने कभी अपनी कला से समझौता नहीं किया। जब राज कपूर ने पहली बार उन्हें 'सबका देश' नाटक में सुनकर फिल्म 'आग' के लिए गीत लिखने का न्योता दिया, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया था कि वे पैसे के लिए नहीं लिखते। बाद में आर्थिक तंगी के कारण जब वे राज कपूर के पास गए, तो राज कपूर ने सहृदयता से उन्हें अपनाया।
वामपंथी विचारधारा से जुड़ाव: वे 'इप्टा' (IPTA) से गहराई से जुड़े थे। जन आंदोलनों और मजदूरों के हक में लिखी उनकी कविताएं सीधे दिल को छूती थीं।
'तीसरी कसम' का आर्थिक झटका: फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पर आधारित फिल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण शैलेन्द्र ने किया था। यह फिल्म सिनेमाई दृष्टि से एक शाहकार साबित हुई, लेकिन व्यावसायिक रूप से असफल रहने के कारण वे गहरे कर्ज में डूब गए, जिसने मानसिक रूप से उन्हें तोड़ दिया।
शैलेन्द्र के सदाबहार गीत और फिल्में
आवारा (1951): "आवारा हूँ" - यह गीत वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हुआ और इसने एक बेघर, आम इंसान के जीवन के दर्द को स्वर दिया।
श्री 420 (1955): "मेरा जूता है जापानी" तथा "प्यार हुआ इकरार हुआ" - इन गीतों में एक तरफ भारतीयता और सामाजिक यथार्थ था, तो दूसरी तरफ प्रेम की मासूमियत।
मदर इंडिया (1957): "ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना" - भारत के ग्रामीण जीवन, गरीबी और पलायन की पीड़ा को बेहद संजीदगी से दर्शाया।
अनाड़ी (1959): "सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी" - यह गीत सीधे तौर पर समाज की चालाकियों और एक सीधे-सादे इंसान के सीधेपन पर करारा व्यंग्य है।
गाइड (1965): "वहाँ कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ" - इस गीत में जीवन के अंतिम सत्य, दर्शन और वैराग्य की अद्भुत झलक मिलती है।
तीसरी कसम (1966): "सजन रे झूठ मत बोलो" - जीवन के नैतिक मूल्यों और सादगी से भरा यह गीत आज भी लोगों की जुबान पर है।
शैलेन्द्र के गीतों में जो सादगी थी, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। उन्होंने बहुत ही कठिन और गहरे विचारों को इतने सरल शब्दों में पिरोया कि वह हर आम इंसान के दिल तक पहुँच गया।

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