'गुड गर्ल' सिंड्रोम और वैवाहिक जीवन: सामाजिक संस्कार बनाम आत्म-अभिव्यक्ति !
बचपन से ही लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि उनकी 'अच्छाई' और सामाजिक प्रतिष्ठा उनकी यौन संयम, लज्जा और सीमाओं में रहने से जुड़ी है। समाज में महिलाओं के पहनावे, दोस्तों और व्यवहार पर अनकही पाबंदियाँ लगाकर यह संदेश दिया जाता है कि कामुकता या अपनी इच्छाओं को प्रकट करना 'गलत' है। यह सामाजिक संस्कार अक्सर माताओं द्वारा सुरक्षा के नाम पर अपनी बेटियों में स्थानांतरित किया जाता है, जो आगे चलकर गहरे मानसिक अवरोध का रूप ले लेता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के 2024 के एक अध्ययन अनुसार, बचपन में यौन विषयों को लेकर मिला नकारात्मक संदेश वयस्कता में गहरे यौन अपराधबोध का कारण बनता है। विवाह के बाद यह उम्मीद करना कि दशकों पुराना यह संकोच और भय अचानक गायब हो जाएगा, पूरी तरह से अवास्तविक है।
विवाह के सामाजिक लाइसेंस के बावजूद, यह पुराना डर और संकोच महिलाओं के अवचेतन मन में बना रहता है। इसके परिणामस्वरूप वे:
अपने पति के सामने अपनी इच्छाएँ और पसंद व्यक्त करने में असमर्थ रहती हैं।
खुद को अभिव्यक्त करने में लज्जा, असहजता या खुद के 'गलत' होने का अपराधबोध महसूस करती हैं।
पहल करने से डरती हैं कि कहीं उनका साथी उन्हें 'गलत श्रेणी' की औरत न समझ ले।
जब पति इस झिझक या संकोच को अस्वीकृति के रूप में देखता है, तो दोनों साझेदारों के बीच संवादहीनता और गलतफहमी पैदा होती है, जो अंततः वैवाहिक आत्मीयता को नुकसान पहुँचाती है।
यह विषय पारंपरिक मूल्यों पर हमला नहीं है और न ही यौन स्वतंत्रता का कोई अनिवार्य पैमाना है। यौन स्वतंत्रता का अर्थ यह चुनाव करना है कि महिला क्या चाहती है—चाहे वह विवाह तक प्रतीक्षा करना हो या अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करना। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या महिलाओं को अपने शरीर और इच्छाओं के बारे में बिना किसी शर्म या अपराधबोध के स्वतंत्र रूप से चुनने और संवाद करने का अधिकार व वातावरण मिल पा रहा है।
जब तक हम एक 'अच्छी लड़की' की परिभाषा को उसके शरीर से दूरी और संकोच के आधार पर तय करना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह अवचेतन अपराधबोध वैवाहिक रिश्तों की नींव को कमजोर करता रहेगा।

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