कानून का ढोंग और व्यवस्था की गहरी नींद !
वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद कानूनों को सख्त बनाया गया और बलात्कार की परिभाषा को व्यापक किया गया। लेकिन 2013-2019 के आंकड़े और हालिया घटनाएं यह साबित करती हैं कि केवल कानून की धाराएं बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती। जब तक कानून का खौफ सड़कों पर नहीं दिखेगा, ये बदलाव महज़ कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट तक एक निजी बस में रात भर नाबालिग बच्ची के साथ दरिंदगी होती रही, लेकिन रास्ते में न किसी पुलिस गश्त की नज़र पड़ी, न नाकेबंदी पर बस रोकी गई और न ही सीसीटीवी निगरानी का कोई फायदा मिला। यह सुरक्षा एजेंसियों और पुलिसिंग सिस्टम की अक्षमता और घोर लापरवाही को नग्न रूप में उजागर करता है।
देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली महिलाओं के लिए असुरक्षित बनी हुई है। "बहुस्तरीय सुरक्षा" और "कड़े पहरे" के दावे अपराधियों के बेखौफ रवैये के सामने पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं।
सख्त कानून और गश्त के तमाम सरकारी दावों के बावजूद व्यवस्था की आपराधिक लापरवाही और पुलिसिंग तंत्र की नाकामी के कारण अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।

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