दिखावे की भक्ति और जीते-जी उपेक्षा !
जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया।
मुट्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाया॥
पाखंड और सामाजिक कड़वी सच्चाई पर कबीर का प्रहार
कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से समाज में फैले आडंबर, खोखले कर्मकांड और बनावटी परंपराओं पर सीधा प्रहार करते हैं:
जीवित माता-पिता का निरादर: जब माता-पिता जीवित होते हैं, तब लोग अक्सर उनकी सेवा नहीं करते, उनकी जरूरतों का ध्यान नहीं रखते और उन्हें शारीरिक व मानसिक कष्ट देते हैं।
मृत्यु के बाद का दिखावा: माता-पिता के गुजर जाने के बाद लोग समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाने के लिए बड़े-बड़े श्राद्ध, भोज और अनुष्ठान आयोजित करते हैं।
कर्मकांड का पाखंड: कबीर जी चुटकी लेते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति जीवनभर अपने पिता को एक रोटी के लिए तरसाता रहा, वही मृत्यु के बाद मुट्ठी भर चावल (पिंडदान) छत पर रखकर कौवों को बुलाता है और मानता है कि उसने अपने पिता को तृप्त कर दिया।
कबीर का संदेश
कबीरदास जी का मानना है कि वास्तविक धर्म और सेवा 'जीवित' रहते की जाती है। मृत्यु के बाद किए जाने वाले दिखावटी कर्मकांड और आडंबर केवल मन को छलने और समाज को दिखाने का जरिया हैं। यदि सच्चा सम्मान देना है, तो माता-पिता के जीवित रहते उनकी सेवा करें और उन्हें प्रेम दें, क्योंकि चले जाने के बाद कौवों को तृप्त करने से उनका ऋण नहीं चुकता।
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