लक्जरी मुकदमेबाजी का बोझ: जब अमीरों की रंजिश की कीमत चुकाते हैं गरीब!
सर्वोच्च न्यायालय की 'लक्जरी लिटिगेशन' (विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी) के खिलाफ हालिया चेतावनी एक स्वागत योग्य कदम है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने दो प्रभावशाली पक्षों के बीच 11 साल पुराने एक विवाद की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालतें व्यक्तिगत रंजिशें भुनाने या बिना किसी वास्तविक कारण के मुकदमे चलाने का जरिया नहीं बन सकतीं। शीर्ष अदालत ने इस विवाद को खारिज करते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं पर 5-5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
भारत की अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ है—वर्तमान में 5.6 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 11 लाख से अधिक मामले 20 साल से भी अधिक समय से लटके हुए हैं। मुकदमों की इस लंबी कतार के मुख्य कारणों में न्यायाधीशों के रिक्त पद, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, बार-बार तारीखें (स्थगन), जांच में देरी, और कमजोर केस प्रबंधन शामिल हैं।
अदालती देरी का सबसे भयानक प्रभाव असमानता पर पड़ता है:
अमीर और प्रभावशाली याचिकाकर्ता: इनके लिए लंबा खींचता मुकदमा केवल वकीलों की एक और फीस या सुनवाई भर होता है।
गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग: इनके लिए अदालत के चक्कर का मतलब है—मजदूरी का नुकसान, बढ़ता कर्ज और अनिश्चितता से भरे कई साल।
अंडरट्रायल (विचाराधीन कैदी): अपराध सिद्ध होने से पहले ही वे अपनी जिंदगी और आजादी के कई अनमोल साल जेल में गंवा देते हैं।
हालांकि केवल जुर्माना लगाना इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। न्यायिक सुधारों के लिए कड़े केस प्रबंधन, बार-बार सुनवाई टालने पर रोक, रिक्त पदों को जल्द भरने, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और मध्यस्थता जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। न्याय व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य केवल लंबित मामलों की फाइलों को कम करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि जो व्यक्ति इंतजार करने में सबसे कम सक्षम है, उसे सबसे लंबा इंतजार न करना पड़े।

Comments
Post a Comment