अपवाद की स्थिति: क्या भारत में भेदभाव सामान्य बनता जा रहा है?

    


वर्ष 2007 के बाद पहली बार संयुक्त राष्ट्र नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) द्वारा भारत में नस्लीय व जातीय भेदभाव की स्थिति की गहन समीक्षा की गई है। इस समीक्षा में समिति ने अल्पसंख्यकों, दलितों और गैर-नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, डेटा में पारदर्शिता की कमी तथा मानवाधिकार निकायों की स्वायत्तता में आई गिरावट पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

यह रिपोर्ट भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, नीतिगत चिंताओं और नागरिक समाज की वर्तमान स्थिति का एक स्पष्ट और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

UN-CERD रिपोर्ट: मुख्य बिंदु और वैश्विक चिंताएं

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने भारत द्वारा 'सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन (1968)' के अनुपालन पर अपनी समीक्षा रिपोर्ट जारी की है।

हिंसा पर चिंता: समिति ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अल्पसंख्यक एथनिक व धार्मिक समूहों, दलितों और गैर-नागरिकों के प्रति हिंसा पर "गंभीर चिंता" व्यक्त की है।

'नस्ल' बनाम 'जाति' का तर्क: भारत सरकार का रुख रहा है कि 'जातिगत भेदभाव' कन्वेंशन के अनुच्छेद 1 के तहत 'नस्ल' (Race) के दायरे में नहीं आता।

संयुक्त राष्ट्र का रुख: समिति के अनुसार, जन्म या वंशगत स्थिति के आधार पर होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को इस कन्वेंशन के तहत शामिल माना जाता है।

ज़मीनी हकीकत: नीतिगत और सामाजिक चुनौतियाँ

1. अमानवीय प्रथाओं का जारी रहना

कड़े कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद, सीवर और सेप्टिक टैंकों की हाथ से सफाई (Manual Scavenging) जैसी अमानवीय प्रथाएँ आज भी समाज में मौजूद हैं।

2. नफ़रत फैलाने वाला भाषण (Hate Speech)

भारतीय न्याय संहिता (BNS) में नस्लीय और नफ़रती भाषणों को स्पष्ट और सख्त रूप से आपराधिक श्रेणी में शामिल न किया जाना एक बड़ी नीतिगत कमी के रूप में देखा जा रहा है।

3. नागरिकता और निर्वाचक अधिकार

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के माध्यम से लोगों के नागरिकता से वंचित होने का जोखिम, मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाया जाना और रोहिंग्या मुसलमानों का निष्कासन नागरिक अधिकारों पर सवाल खड़े करता है।

संस्थागत ढांचा और नागरिक समाज पर प्रभाव

नागरिक समाज पर नकेल: FCRA, UAPA, AFSPA और PMLA जैसे सख्त कानूनों का प्रयोग करके गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के काम को बाधित किया जा रहा है।

पर्यावरण और जन-सहमति: वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम के तहत "राष्ट्रीय सुरक्षा" परियोजनाओं को जन-परामर्श प्रक्रिया से छूट दी गई है, जिससे स्थानीय समुदायों की आवाज़ कमजोर होती है।

डेटा का अभाव और पारदर्शिता की कमी: समय पर जनगणना ना होने और NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों में देरी से वास्तविक डेटा का अभाव है। 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर नीतियाँ लागू करने से अनुसूचित जनजातियों और आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में आई गिरावट छिप सकती है।

NHRC की स्वायत्तता पर सवाल: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति और बहुलवाद की कमी के कारण पिछले वर्ष Global Alliance of National Human Rights Institutions द्वारा इसकी रेटिंग घटाने की सिफारिश की गई थी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि और आंतरिक सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि भेदभाव की किसी भी स्थिति को सामान्य न बनने दिया जाए। नीतिगत सुधार, संस्थागत स्वायत्तता की बहाली और डेटा की पारदर्शिता ही इस दिशा में ठोस कदम सिद्ध हो सकते हैं।

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