हिमालयी चेतावनी: नेपाल और तिब्बत के बदलते भूगोल का बिहार पर संकट !

 




जलवायु परिवर्तन, पिघलती हिमनद झीलें और सीमा पार की नदियों के बदलते स्वरूप पर एक गहन विश्लेषण। 

वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र में एक अप्रत्याशित और गंभीर पर्यावरणीय संकट आकार ले रहा है। तिब्बत और नेपाल के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे अत्यंत अस्थिर हिमनद झीलों का निर्माण हो रहा है। ये झीलें कभी भी टूटकर भयंकर तबाही मचा सकती हैं। इस पर्वतीय संकट का सबसे प्रत्यक्ष और गंभीर प्रभाव निचले मैदानी इलाकों, विशेषकर भारत के बिहार राज्य पर पड़ रहा है।

तीव्र गति से गर्म होता हिमालयी क्षेत्र

IPCC और ICIMOD (2019) के आंकड़ों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।

यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C पर सीमित भी कर दिया जाए, तब भी यह क्षेत्र औसत से 0.3°C अधिक गर्म होगा।

मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में इस सदी के अंत तक यहाँ का तापमान 2.5°C और उच्च उत्सर्जन में 5.5°C तक बढ़ सकता है।

इस क्षेत्र में अत्यधिक ठंडे दिनों और रातों की संख्या लगातार घट रही है, जबकि गर्म दिनों की आवृत्ति बढ़ रही है।

पर्वतीय ढलानों को बांधकर रखने वाली बर्फ पिघलने से मलबे के प्राकृतिक बांधों  के पीछे विशाल और अस्थिर जल निकायों का निर्माण हो रहा है।

ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार 1999-2005 के बीच 8,790 हिमनद झीलों में से 203 को खतरनाक माना गया था। 2018 के उपग्रह सर्वेक्षण में इनकी संख्या में और वृद्धि दर्ज की गई है।

अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील का टूटना तथा नेपाल की त्रिशूली व भोटे कोसी नदियों में मलबे वाली बाढ़ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

चीन द्वारा तिब्बत-नेपाल सीमा पर नई झीलों के टूटने की दी गई चेतावनी यह दर्शाती है कि यह संकट सीमाओं में सीमित नहीं है।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के अनुसार, गंगा के मैदानी इलाकों में कुल मानसूनी वर्षा में हल्की गिरावट आई है, लेकिन वर्षा के पैटर्न में खतरनाक बदलाव हुआ है।

अब लंबी और समान बारिश के बजाय कम समय में अत्यधिक तीव्र बारिश हो रही है, जिससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ता है और बुनियादी ढांचा चरमरा जाता है।

बिहार का लगभग 73% भू-भाग बाढ़ क्षेत्र में आता है और यह देश की कुल बाढ़ प्रभावित आबादी का 22.1% वहन करता है।

उत्तर बिहार की प्रमुख नदियाँ (गंडक, कोसी, बागमती, महानंदा) नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों से आती हैं।

तटबंधों की विफलता: राज्य में बाढ़ नियंत्रण के लिए 3,400 किमी से अधिक लंबे तटबंध बनाए गए, लेकिन इससे बाढ़ प्रवण क्षेत्र 1954 के 2.5 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2004 में 6.89 मिलियन हेक्टेयर हो गया। तटबंधों के भीतर गाद जमा होने से नदी तल ऊंचा उठ जाता है और तटबंध टूटने पर (जैसे 2008 में कुसहा में कोसी नदी की विफलता) भारी तबाही होती है।

चीन, नेपाल और भारत के बीच हिमनद झीलों के जलस्तर और जलविज्ञान डेटा का सीधा व तुरंत आदान-प्रदान होना चाहिए।

उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में ऑटोमेटेड मौसम व झील निगरानी स्टेशन स्थापित किए जाएं, ताकि निचले इलाकों को समय रहते अलर्ट मिल सके।

केवल तटबंधों को ऊंचा उठाना इस जल-जलवायु संकट का समाधान नहीं है; नीतिगत स्तर पर प्रकृति-आधारित समाधानों और गाद प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी।

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