जब पश्चिमी जगत ने ढूंढा भगवद्गीता में मॉडर्न मैनेजमेंट का 'मास्टरकी'!

   




जब भी घर की अलमारी में रखी 'भगवद्गीता' पर नज़र पड़ती है, तो अमूमन मन में विचार आता है—यह तो जीवन के अंतिम पड़ाव या बुजुर्गों के पढ़ने की चीज़ है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किताब को हम केवल पूजा-पाठ और मोक्ष का साधन मानते रहे, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मैनेजमेंट गुरु उसमें भविष्य के लीडर्स तैयार करने का सूत्र खोज रहे हैं?

यह ठीक वैसा ही है जैसे सदियों से हमारी रसोई और आँगन में उगने वाला 'ग्वारपाठा' जब तक 'एलोवेरा' बनकर खूबसूरत बोतलों में नहीं आया, हमने उसकी कीमत नहीं समझी। जब योग 'योगा' बनकर पश्चिम से लौटा, तब हमने उसे दिनचर्या में शामिल किया। अब यही कहानी भगवद्गीता के साथ दोहराई जा रही है।

 2008 में इस कैथोलिक यूनिवर्सिटी ने अपने कोर करिकुलम में भगवद्गीता को शामिल करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। दर्शनशास्त्र और मानव जीवन के मूल्यों को समझने के लिए विदेशी छात्र गीता के अध्यायों का अध्ययन कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, हार्वर्ड से लेकर भारत के IIMs तक—आज हर जगह 'अध्याय 2 का 47वाँ श्लोक' (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन) किसी भी मॉडर्न मैनेजमेंट थ्योरी से बड़ा सबक माना जा रहा है।

आज का वेस्टर्न मैनेजमेंट सिस्टम बाहरी समस्याओं से निपटने पर ध्यान देता है—टार्गेट पूरा करना, डेडलाइन हासिल करना और टर्नओवर बढ़ाना। लेकिन गीता समस्या की नींव यानी 'मनुष्य की सोच' पर काम करती है।

आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया बर्नआउट और डिप्रेशन से जूझ रही है। गीता का 'निष्काम कर्म' सिखाता है कि परिणाम की अत्यधिक चिंता किए बिना प्रक्रिया  पर ध्यान केंद्रित कैसे करें।

श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वह केवल युद्ध जीतने के लिए नहीं था। वह एक भ्रमित लीडर को निर्णय लेने की क्षमता देने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

गीता में अधिकारों से ज्यादा 'जिम्मेदारी' और 'कर्तव्य' पर बल दिया गया है, जो आज की कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ाने का सबसे बड़ा मूलमंत्र है।

देर से ही सही, अब भारत में भी बदलाव की हवा बह रही है। राजस्थान यूनिवर्सिटी के कॉमर्स व मैनेजमेंट कोर्स से लेकर देश के कई अग्रणी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में गीता के व्यावहारिक पहलुओं को जोड़ा जा रहा है, ताकि बच्चों में कम उम्र से ही सही और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो सके।

भगवद्गीता पढ़ने से आप किसी संप्रदाय से बँधते नहीं हैं, बल्कि आप एक बेहतर निर्णय लेने वाले, तनावमुक्त और कुशल इंसान बनते हैं। अगर हमने समय रहते अपनी विरासत की कद्र नहीं की, तो कल हमें अपने ही ग्रंथों को समझने के लिए विदेशी ऑथर्स की किताबें खरीदनी पड़ेंगी।

अगर अभी तक आपके घर में गीता केवल लाल कपड़े में लपेटकर रखी है, तो उसे खोलिए। इसे बुजुर्गों के लिए नहीं, अपने बच्चों और स्वयं के लिए पढ़िए। नाम चाहे 'ग्वारपाठा' कहें या 'एलोवेरा'—जीवन को आरोग्य देने वाली संजीवनी तो वही है!

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