प्रकृति का तांडव: जब बिखर गया इंसानी घमंड!

 




 जान बचाने के लिए सांस लेने तक की मोहलत नहीं थी।

सूर्य की पहली किरण के साथ वह शहर रोज़ की तरह जाग रहा था। गगनचुम्बी इमारतें अपनी शान-शौकत का ढिंढोरा पीट रही थीं, और सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां इंसान की तरक्की की गवाही दे रही थीं। रमेश भी अपने नवनिर्मित तीन मंजिला संगमरमर के महल की छत पर खड़ा होकर अपनी संपत्ति को निहार रहा था। जीवन भर उसने इस धन-दौलत, नाम और रुतबे को कमाने में क्या-कुछ नहीं किया—छल, कपट, दिन-रात का चैन और रिश्तों की बलि। उसके लिए पैसा ही सब कुछ था।

लेकिन कुदरत खामोशी से अपना हिसाब लिख रही थी। इंसानों ने जिस बेदर्दी से जंगलों को काटा था, नदियों का गला घोंटा था और हवाओं में ज़हर घोला था, उसकी आहुति मांगने का वक्त आ चुका था।

अचानक, धरती के सीने से एक गहरा, भयानक कंपन उठा।

गड़गड़ाहट इतनी तेज़ थी कि लगा जैसे आसमान फट पड़ा हो। कुछ ही सेकंडों में वह आलीशान महल, जिसे बनाने में रमेश ने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी थी, ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े गिरने लगे और चीख-पुकार से पूरा आसमान थर्रा उठा।

सड़कों का नज़ारा हृदयविदारक था। लोग बदहवास होकर इधर-उधर भाग रहे थे। किसी के हाथों में वह तिजोरी नहीं थी जिसे बचाने के लिए वे कल तक मरते-मिटते थे। किसी के गले में वे बेशकीमती जेवर नहीं थे। उस खौफनाक मंजर में न कोई अमीर था, न कोई गरीब; न किसी की शान-शौकत काम आ रही थी, न ही कोई ज्ञान-विज्ञान। मौत का मंजर आँखों के ठीक सामने था और इंसान के पास अपनी जान बचाने के लिए मिनट-सेकंड तो दूर, सांस लेने तक की मोहलत नहीं थी।

रमेश के सामने उसकी गाड़ियां जल रही थीं, उसकी अटारी धूल में मिल चुकी थी। "मेरी तिजोरी! मेरी जायदाद!" चिल्लाने वाला रमेश आज सिर्फ अपनी सांसों की भीख मांग रहा था। उसने मुड़कर देखा, लोग अपने बच्चों और परिवार को बचाने के लिए पागलों की तरह भाग रहे थे, लेकिन प्रकृति के उस रौद्र रूप के आगे सब लाचार थे। पलक झपकते ही सैकड़ों जिंदगियां मलबे के नीचे दफन हो गईं। प्रकृति ने कुछ ही पलों में इंसान को उसकी औकात दिखा दी थी।

जब तबाही का धुआं थोड़ा छंटा, तो चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा और बिखरी हुई लाशें थीं। न मिट्टी में दबे उस सोने का कोई मोल बचा था, न ही उन कागजी नोटों का।

उस दिन इंसान ने जाना कि जीवन का असली मूल्य क्या है। जिस धन को कमाने के लिए इंसान अपनों को भूल जाता है, वह विनाश के एक पल में ढाल भी नहीं बन सकता। नेपाल की उस धरती से उठी चीखें पूरे मानव समाज के लिए एक खौफनाक चेतावनी हैं—यदि हम प्रकृति का दोहन ऐसे ही करते रहे, जंगलों को उजाड़ते रहे, तो आने वाली नस्लों को इसकी कीमत अपनी सांसों से चुकानी होगी। जब कुदरत अपने न्याय पर आती है, तो इंसानी घमंड धूल से ज्यादा कुछ नहीं होता।

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