लूटशाही व्यवस्था पर निगरानी का करारा प्रहार: जब ‘जनता के सेवकों’ ने वाशिंग मशीन और नोटों में बेची ईमानदारी!
अधिकारियों के साथ-साथ उनके घरेलू नौकर और दलाल तक करोड़पति बन रहे हैं।
बिहार में भ्रष्टाचार का दीमक अब इस कदर जड़ें जमा चुका है कि सरकारी पद जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि निजी तिजोरियाँ भरने और ऐशो-आराम जुटाने का जरिया बन गए हैं। आम आदमी अपने ही हक, जमीन और इंसाफ के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है, जबकि अफसरशाही पूरी निर्लज्जता के साथ जनता की गाढ़ी कमाई को 'बाप की बपौती' समझकर लूटने में जुटी है।
हाल ही में समस्तीपुर के रोसड़ा से सामने आया मामला इस सड़न का ज्वलंत उदाहरण है। भूमि सुधार उप-समाहर्ता (DCLR) कंचन कुमारी झा और उनके घरेलू नौकर (दलाल) सुमित कुमार को निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने ₹2 लाख नकद और ₹37,000 की नई वॉशिंग मशीन की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। सरकारी आवास से मिला ₹13.82 लाख का अतिरिक्त कैश यह बताने के लिए काफी है कि कैसे आम जनता का खून-पसीना पानी की तरह बहाया जा रहा है।
व्यवस्था पर कुछ चुभते सवाल:
नीचे से ऊपर तक बना सिंडिकेट: राजस्व और भूमि सुधार विभाग में भ्रष्टाचार किस सीमा तक फैला है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकारियों के साथ-साथ उनके घरेलू नौकर और दलाल तक करोड़पति बन रहे हैं।
इंसाफ का रेट कार्ड: जमीन विवाद में फैसला सुनाने के बदले सिर्फ कैश ही नहीं, बल्कि घर के राशन और वाशिंग मशीन जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक की सौदेबाजी की जा रही है।
पारदर्शिता का खोखला दावा: अगर आज बिहार के सभी छोटे-बड़े प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्तियों की निष्पक्ष और गहन जांच करा दी जाए, तो यकीनन राज्य की जेलें अधिकारियों से भर जाएंगी।
पीड़ित मनोज कुमार की हिम्मत और निगरानी विभाग की यह त्वरित कार्रवाई प्रशंसनीय है। लेकिन सवाल अब भी बरकरार है—क्या एक-दो अफसरों की गिरफ्तारी से व्यवस्था सुधरेगी या जनता ऐसे ही घूसखोरी के बोझ तले पिसती रहेगी? जब तक रिश्वतखोरों पर नकेल कसकर कठोरतम सजा नहीं दी जाएगी, तब तक "सुशासन" का दावा पूरी तरह बेमानी ही रहेगा।

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