रहना नहीं देश वीराना है: मिथिलेश सिंह को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और एक संकल्प की शुरुआत !
जमालुद्दीन चक स्थित उत्सव हॉल में आज उत्सव का रंग नहीं, बल्कि एक गहरा सन्नाटा और मातम पसरा था। वही उत्सव हॉल, जिसके स्वामी मिथिलेश सिंह कभी अपनी ऊर्जा और हंसी से वातावरण में प्राण फूंक दिया करते थे, आज उनके बिना सूना पड़ा था। महज 50 वर्ष की अल्पायु में उनका आकस्मिक निधन हर किसी को स्तब्ध कर गया। आज जब उनकी तेरहवीं और श्रद्धांजलि सभा में लोग एकत्र हुए, तो सभी की आंखें नम थीं।
मिथिलेश जी एक बेहतरीन स्पोर्ट्समैन थे। रोबदार व्यक्तित्व, सुगठित शरीर और चेहरे पर एक खास मुस्कान—उन्हें देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि नियति ने उनके लिए क्या लिख रखा है। उन्हें याद करते हुए संत कबीर की यह पंक्ति स्वतः ही होंठों पर तैर आती है—“रहना नहीं देश वीराना है...” यह नश्वर संसार किसी वीराने से कम नहीं, जहाँ सब कुछ क्षणभंगुर है।
श्रद्धांजलि सभा के दौरान 'सूत्रधार' नाट्य संस्था के महासचिव नवाब आलम, प्रो. प्रसिद्ध कुमार, उप-सरपंच पप्पू कुमार, बी.एस. कॉलेज दानापुर के परीक्षा नियंत्रक प्रो. प्रभास कुमार और प्रसून कुमार उर्फ टिंकू जी समेत सैकड़ों गणमान्य लोगों और स्थानीय निवासियों ने स्व. मिथिलेश सिंह के तैलचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर अपनी भावभीनी संवेदनाएं प्रकट कीं।
इस भावुक अवसर पर सूत्रधार के सहयोगी और मिथिलेश जी के अग्रज अस्तानंद जी ने एक बेहद सार्थक और प्रेरणादायक विचार सामने रखा। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि स्व. मिथिलेश सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाए, जहाँ छात्रों को पठन-पाठन की सामग्री वितरित की जाए और विभिन्न शैक्षणिक व रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए।
किसी प्रियजन के चले जाने के गम को अगर समाज की सेवा और बच्चों के भविष्य को संवारने में बदल दिया जाए, तो उससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई दूसरी नहीं हो सकती। सूत्रधार नाट्य संस्था ने अस्तानंद जी के इस विचार को पूरी गंभीरता से लिया है और संस्था जल्द ही इस योजना का एक विस्तृत ब्लू प्रिंट तैयार करने जा रही है।
मिथिलेश सिंह भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन शिक्षा और कला के प्रकाश के रूप में उनकी स्मृति हमेशा हम सभी के दिलों में जीवित रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और शोकाकुल परिवार को यह अपार दुख सहने की शक्ति दे।


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