उत्तर क्रांति: जब यूनिवर्सिटी ने खत्म किया पेपर लीक का 'डिप्रेशन'!
प्रश्न पत्र के साथ answer भी।
शिक्षा जगत में रोज़ नए-नए प्रयोग होते रहते हैं, लेकिन राजस्थान यूनिवर्सिटी ने जो ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है, उसकी कल्पना तो स्वयं नोबेल पुरस्कार समिति ने भी नहीं की होगी। जहाँ देश भर के युवा 'पेपर लीक' के डर से अवसाद में चले जाते हैं, वहीं जयपुर की इस महान यूनिवर्सिटी ने समस्या की जड़ पर ही प्रहार कर दिया। ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बंसुरी—और ना होगी लीक की टेंशन, जब प्रश्न पत्र के साथ उत्तर पत्र ही 'फ्री' होम डिलीवरी में मिल जाए!
मामला एमए समाजशास्त्र के द्वितीय सेमेस्टर का है। परीक्षार्थी हाथों में पेन और दिमाग में डिप्रेशन लिए 'इंडियन सोसायटी' का पेपर देने पहुँचे थे। दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं कि न जाने कौन सा कठिन सवाल सामने आ जाए। पर जैसे ही प्रश्न पत्र हाथ में आया, परीक्षार्थियों की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी—खुशी के आँसू! सवालों के नीचे बाकायदा थ्योरी और उत्तर छपे हुए थे, वो भी शायद किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की असीम अनुकंपा से।
सोचिए, कितना क्रांतिकारी विचार है!
छात्र को उत्तर याद करने की झंझट से मुक्ति।
नकल करने के लिए पर्चियाँ या चप्पल में ब्लूटूथ छिपाने की मेहनत से बचत।
और सबसे बढ़कर, उत्तर सही है या गलत, यह सोचने की भी सिरदर्दी नहीं!
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जाने-अनजाने में समाजशास्त्र का सबसे व्यावहारिक पाठ पढ़ा दिया था: "जब समाज में सब कुछ पहले से तय है, तो उत्तर भी पहले से तय होने चाहिए।"
हालांकि, कुछ सिरफिरे छात्रों को यह 'डिजिटल इंडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का मास्टरस्ट्रोक पसंद नहीं आया और उन्होंने हंगामा कर दिया। प्रशासन को मजबूरन पेपर वापस लेना पड़ा और 27 जून के लिए परीक्षा टालनी पड़ी। प्रशासन का यह कदम थोड़ा निराशाजनक था—आखिर जो सुविधा घर बैठे चैटजीपीटी (ChatGPT) दे रहा था, वही अगर परीक्षा हॉल में मिल रही थी, तो इसमें हर्ज ही क्या था?
अक्सर कहा जाता है कि परीक्षा का उद्देश्य ज्ञान की परीक्षा लेना है, लेकिन राजस्थान यूनिवर्सिटी ने साबित कर दिया कि परीक्षा का असली उद्देश्य केवल कागज़ काले करना है—चाहे वो छात्र करे या प्रिंटिंग प्रेस!
भविष्य के लिए सुझाव यही है कि अन्य विश्वविद्यालयों को भी इस 'उत्तर-क्रांति' से प्रेरणा लेनी चाहिए। जब उत्तर साथ मिलेंगे, तो ना कोई फेल होगा, ना कोई लीक का रोना रोएगा। अंततः, देश का हर युवा एमए पास होगा—भले ही उसे यह न पता हो कि समाजशास्त्र और सब्जीमंडी में क्या अंतर है!
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