शिक्षा का राजनीतिकरण और वैज्ञानिक चेतना का क्षरण: प्रतीकवाद बनाम वास्तविक सुधार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
शिक्षा केवल भवनों का निर्माण या नामांकरण का खेल नहीं है; यह किसी राष्ट्र के भविष्य की रीढ़ और बालमन की सोच को गढ़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल ही में राज्य के 551 स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नाम पर 'सरस्वती विद्या निकेतन' की अवधारणा लाने और परिसरों के रंग-रोगन को लेकर जो नीतियां सामने आ रही हैं, वे शिक्षा के मूल उद्देश्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यद्यपि सरकार का यह स्पष्टीकरण राहत देने वाला है कि दानदाताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर बने स्कूलों के नाम नहीं बदले जाएंगे, परंतु शिक्षा व्यवस्था के प्रतीकात्मक ढर्रे और विचारधारात्मक बदलाव की कोशिशों पर एक गंभीर बहस की आवश्यकता है।
जिस देश में महात्मा ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख जैसे समाज सुधारकों ने असीम यातनाएं और सामाजिक बहिष्कार सहकर बालिकाओं एवं वंचितों के लिए शिक्षा के द्वार खोले, आज उनके व्यावहारिक संघर्ष और वैज्ञानिक चेतना को नेपथ्य में धकेला जा रहा है। शिक्षा का ध्येय तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और खोजी मानसिकता का विकास करना है। जब शैक्षणिक संस्थानों में वास्तविक संघर्षों के बजाय वैचारिक या प्रतीकात्मक अवधारणाओं को वरीयता दी जाती है, तो यह अंदेशा पैदा होता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्र विचारक बनाने के बजाय एक विशिष्ट विचारधारा का अनुगामी तो नहीं बना रहे?
रंग केवल सौंदर्य या किसी राजनीतिक/धार्मिक पहचान का जरिया नहीं हैं। विज्ञान और मनोविज्ञान में रंगों का मानव मस्तिष्क, एकाग्रता और तंत्रिका तंत्र पर सीधा प्रभाव सिद्ध हो चुका है।
अत्यधिक भड़कीले या उच्च तरंगदैर्घ्य वाले रंग जैसे गहरा लाल, नारंगी या चटख भगवा आँखों पर अधिक दबाव डालते हैं।
शैक्षणिक वातावरण: कक्षाओं और शैक्षणिक भवनों के लिए हल्के और तटस्थ रंग जैसे हल्का हरा, हल्का नीला, ऑफ-व्हाइट या क्रीम रंग अनुशंसित होते हैं। हल्का नीला और हरा रंग मस्तिष्क में अल्फा तरंगों को बढ़ावा देते हैं, जिससे तनाव घटता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है।
अस्पतालों में हल्का हरा या नीला रंग इसलिए चुना जाता है क्योंकि यह रोगियों के तंत्रिका तंत्र को शांत रखता है।
सरकारी कार्यालयों और स्कूलों का उद्देश्य समानता, शांति और तटस्थता का प्रतीक होना है। किसी भी सार्वजनिक या शैक्षणिक इमारत का रंग ऐसा होना चाहिए जो किसी भी राजनीतिक या धार्मिक पूर्वाग्रह से मुक्त हो और वातावरण को शांत व अध्ययन-अनुकूल बनाए।
आज का युग विज्ञान, शोध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग है। यदि हमें देश के नौनिहालों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाना है, तो हमें उन्हें 'लकीर का फकीर' या अंधभक्त बनाने के बजाय प्रश्न पूछने वाला, तर्कशील और नवाचार-उन्मुख बनाना होगा।
सरकार को केवल नामांकरण, रंग-रोगन या प्रतीकात्मक बदलावों तक सीमित रहने के बजाय स्कूलों में:
आधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाओं का निर्माण करना चाहिए,
विश्वस्तरीय पुस्तकालय और डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए,
और शिक्षकों की गुणवत्ता व वैज्ञानिक पाठ्यक्रम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
विद्यार्थियों को केवल 'विद्यार्थी' ही रहने दिया जाए—उन्हें किसी वैचारिक या राजनीतिक रंग में रंगने के बजाय तर्क और ज्ञान के असीम आकाश में उड़ने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

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