हरित भविष्य की ओर: धान की खेती और पर्यावरण का संतुलन !

 


 


 

भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में से एक है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों (जैसे Nature Food) से यह बात सामने आई है कि पारंपरिक सिंचित धान के खेत वैश्विक स्तर पर मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में शामिल हो चुके हैं।

यह इस चुनौती के प्रमुख कारणों, इसके वैज्ञानिक पहलुओं और उन प्रेरणादायक तकनीकों पर प्रकाश डालता है, जिनके माध्यम से भारत अपनी खाद्य सुरक्षा को बनाए रखते हुए पर्यावरण संरक्षण का नया मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

उत्सर्जन में वृद्धि: 1960 के दशक के बाद से धान की खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में दोगुनी वृद्धि देखी गई है। वैश्विक स्तर पर धान के खेतों से प्रतिवर्ष लगभग 1.1 अरब टन CO₂-समकक्ष गैसों का उत्सर्जन होता है।

भारत की स्थिति: भारत में सिंचित धान के खेत सालाना लगभग 3.9 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन करते हैं, जो जर्मनी के कुल वार्षिक मीथेन उत्सर्जन से भी अधिक है।

खेतों में लगातार जलभराव जिससे ऑक्सीजन-रहित परिस्थितियाँ बनती हैं और मीथेन बनाने वाले सूक्ष्मजीव पनपते हैं।

नाइट्रोजन उर्वरकों का अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग।

मिट्टी में जैविक कार्बन की हानि और फसल अवशेषों (जैसे पराली/पुआल) का अनुचित प्रबंधन।

शोधकर्ताओं और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि सही तकनीकों और प्रबंधन से सदी के मध्य (2050) तक धान की खेती से होने वाले उत्सर्जन में 10% या उससे अधिक की कमी लाई जा सकती है:

इसमें छोटे पौधों की सटीक रोपाई की जाती है और खेतों को लगातार पानी में डुबोकर रखने के बजाय वैकल्पिक रूप से सुखाया और सींचा जाता है।

केवल धान पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय क्षेत्रीय जलवायु के अनुसार बाजरा, दलहन व अन्य वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देना।

नाइट्रोजन उर्वरकों के संतुलित उपयोग और फॉस्फोगिप्सम जैसे मृदा-सुधारकों के प्रयोग से उप-मृदा स्तर पर उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सकता है।

तकनीकी बदलाव तभी संभव है जब किसानों को प्रशिक्षित और प्रोत्साहित किया जाए:

 राज्य और क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, मिट्टी और सिंचाई सुविधाओं के अनुसार अनुकूलित मॉडल तैयार किए जा रहे हैं।

किसानों को वैकल्पिक फसलें उगाने और कम उत्सर्जन वाली तकनीकें अपनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन, प्रशिक्षण और स्वयं सहायता समूहों  का सहयोग दिया जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और कृषि उत्पादकता एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं। आधुनिक तकनीकों, जल प्रबंधन और नीतिगत सहयोग के साथ भारत खाद्य आत्मनिर्भरता के साथ-साथ जलवायु रक्षा में भी दुनिया के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।

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