राजनीति का भंवर और छात्र आक्रोश: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पूरी कहानी!

 




केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारतीय राजनीति और छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर उभरा है। देश भर में परीक्षा पत्रों के लीक होने की घटनाओं और छात्रों के लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बाद, अंततः नरेंद्र मोदी सरकार पर बने भारी दबाव के कारण उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। GenZ (युवा पीढ़ी) के इस प्रचंड विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया कि युवाओं की चिंताएं सत्ता के समीकरणों पर भारी पड़ सकती हैं।

राजनीति में निरंतर बढ़त और पारिवारिक पृष्ठभूमि

1969 में ओडिशा के तालचर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान का संबंध लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े परिवार से रहा है। उनके पिता देबेंद्र प्रधान भी संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता और वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके थे।

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उत्कल विश्वविद्यालय से एंथ्रोपोलॉजी (मानव विज्ञान) में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने वाले प्रधान ने 2000 में ओडिशा विधानसभा से चुनाव जीता। इसके बाद 2004 और 2024 में लोकसभा सांसद तथा राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने पर उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इस पद पर सात साल तक रहकर वे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले पेट्रोलियम मंत्री बने, जिनके कार्यकाल में 'उज्जवला योजना' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू हुईं। 2021 में उन्हें शिक्षा मंत्रालय सौंपा गया, जो संघ परिवार के वैचारिक दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग माना जाता है।

नियति का एक अजीब चक्र

धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक सफर में एक विडंबनापूर्ण मोड़ तब देखने को मिला, जब 1997 में ओडिशा में ABVP के एक विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ आवाज उठाने पर पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया था। तीन दशक बाद, वही धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद पर रहते हुए खुद उसी परीक्षा पत्र लीक विवाद के केंद्र में आ खड़े हुए।

विवादों की श्रृंखला और संकट की शुरुआत

शिक्षा मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल केवल प्रश्नपत्र लीक से ही प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि विवादों की एक लंबी श्रृंखला ने उनके खिलाफ माहौल बनाया:

NCERT का विवाद: NCERT के शिक्षक प्रशिक्षण मैनुअल में सेक्स को "जैविक" और जेंडर को "सामाजिक संरचना" बताए जाने पर संघ समर्थकों ने इसे 'वोक एजेंडा' कहकर विरोध किया।

UGC नियम: UGC के नए नियमों पर जातिगत भेदभाव की परिभाषा को लेकर सवाल उठे।

NEET एवं CBSE विवाद: 2024 और उसके बाद NEET परीक्षा के पेपर लीक, CBSE की अंकन प्रक्रिया (marking process) पर सवाल और उत्तर पुस्तिकाओं की गड़बड़ियों ने मध्यम वर्ग और युवाओं के भरोसे को गहरा आघात पहुंचाया।

पतन का मुख्य कारण

मध्यम वर्ग, जो योग्यता और प्रतियोगी परीक्षाओं को सामाजिक और आर्थिक प्रगति का मुख्य जरिया मानता है, का भरोसा इस प्रशासनिक विफलता से डगमगा गया। एक ओर जहां देश का युवा सड़कों पर आक्रोशित था, वहीं दक्षिणपंथी खेमे ने भी प्रधान पर राज्य की राजनीति में उलझकर अपने मुख्य दायित्वों के प्रति लापरवाह रहने का आरोप लगाया।

धर्मेंद्र प्रधान का अब तक का राजनीतिक करियर बिना किसी बड़े झटके के लगातार आगे बढ़ रहा था। लेकिन परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने में विफलता और युवाओं के व्यापक जनाक्रोश ने उनके इस निर्बाध सफर पर अचानक विराम लगा दिया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि प्रशासनिक जवाबदेही के सामने राजनीतिक प्रभाव भी बेअसर साबित हो सकता है।

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