दलित सम्मान पर चोट और भाजपा की दिखावटी राजनीति: श्रेयसी सिंह प्रकरण का आलोचनात्मक विश्लेषण!
भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार समानता, बंधुत्व और हर नागरिक की गरिमा का सम्मान है। किंतु हाल ही में बिहार सरकार की खेल मंत्री श्रेयसी सिंह से जुड़ा एक घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह संवैधानिक मूल्य सिर्फ भाषणों और शपथ पत्रों तक ही सीमित रह गए हैं? राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बिहार प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद द्वारा उठाए गए सवाल न केवल एक राजनीतिक बयानबाजी हैं, बल्कि वे समाज के सबसे वंचित वर्ग—दलित समाज—के प्रति सत्तासीन दल के रवैये पर एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं।
इवेंट-जीवित राजनीति और जमीनी हकीकत
राजनीतिक लाभ और प्रचार के लिए 'इवेंट' तैयार करना वर्तमान दौर की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। मंत्री श्रेयसी सिंह द्वारा दलित समाज की बच्चियों को मिठाई खिलाने का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। जब तक कैमरे की नज़र मंत्री पर थी और वे स्वयं बच्चियों को मिठाई खिला रही थीं, तब तक सब कुछ एक आदर्श 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'दलित प्रेम' का उदाहरण लग रहा था।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दुखद और सबसे घिनौना पहलू तब सामने आया जब उसी दलित समाज की एक बच्ची ने आत्मीयता से मंत्री जी को मिठाई खिलाने की कोशिश की। खेल मंत्री द्वारा बच्ची के हाथों से मिठाई खाने से इनकार करना न केवल उस मासूम की निर्मल भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला है, बल्कि यह उस मानसिकता को भी उजागर करता है जो कैमरे के सामने तो सहभोज का ढोंग करती है, लेकिन कैमरे के पीछे छुआछूत और भेदभाव की सदियों पुरानी जकड़न से मुक्त नहीं हो पाई है।
संवैधानिक शपथ और नैतिक दायित्व की अवहेलना
एक जनप्रतिनिधि और सरकार की मंत्री होने के नाते श्रेयसी सिंह ने संविधान की रक्षा करने और बिना किसी भेदभाव के सभी के साथ न्याय और समानता का व्यवहार करने की शपथ ली है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा निर्मित भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और समानता का अधिकार देता है।
जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति किसी बच्ची के हाथों से सिर्फ इसलिए मिठाई नहीं खाता क्योंकि वह दलित समाज से आती है, तो यह केवल एक बच्ची का अपमान नहीं है—यह भारत के संविधान का, उसकी आत्मा का और बाबा साहेब के सपनों का अपमान है। राजद प्रवक्ता एजाज अहमद का यह आरोप पूरी तरह प्रासंगिक है कि इस कृत्य से मंत्री ने अपनी संवैधानिक शपथ की धज्जियां उड़ाई हैं।
भाजपा का 'दलित प्रेम': ढोंग या वास्तविकता?
यह घटना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दलित प्रेम के दावे की कलई खोलती है। एक तरफ भाजपा अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में दलितों के उत्थान और सम्मान के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ उसके मंत्री और नेता सार्वजनिक मंचों पर इस तरह का संवेदनहीन आचरण करते हैं।
यदि यह आयोजन राजनीतिक लाभ भुनाने और चुनावी गोटियां सेट करने के लिए किया गया एक प्रायोजित कार्यक्रम था, तो इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा का दलित प्रेम केवल वोटों की फसल काटने का साधन मात्र है। इसमें न तो संवेदनशीलता है और न ही दलित समाज के प्रति कोई वास्तविक सम्मान का भाव।
मासूम बच्ची की भावनाओं से खिलवाड़ और दलित समाज का अनादर किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। जैसा कि मांग की गई है, भाजपा नेतृत्व और स्वयं खेल मंत्री श्रेयसी सिंह को इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी गलती स्वीकार करते हुए दलित समाज और देश से स्पष्ट माफी मांगनी चाहिए।
सत्ता और पद पर बैठे लोगों को यह समझना होगा कि समरसता केवल फोटो-ऑप (Photo-Op) या मिठाई खिलाने के ड्रामे से नहीं आती; इसके लिए दिल से जातिवादी ग्रंथि को मिटाना पड़ता है। यदि आज भी हमारे नेता एक दलित बच्ची के हाथ से मिठाई खाने में झिझकते हैं, तो यह हमारे सामाजिक और राजनीतिक पतन का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।


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