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Showing posts from November, 2026

बेटी ने लिया संकल्प, पूरा हुआ मां का सपना – संघर्ष और अटूट विश्वास की प्रेरणादायक दास्तान।

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    ​सफलता किसी बड़े शहर या मँहगे संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह पक्के इरादों और सच्ची मेहनत से तय होती है। इस बात को सच कर दिखाया है बक्सर की गरिमा लोहिया ने, जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा 2022 में देशभर में दूसरी रैंक हासिल कर इतिहास रच दिया। उनकी यह सफलता महज़ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी बेटी और माँ के अटूट संघर्ष, त्याग और विश्वास की मिसाल है जो हर किसी को प्रेरित करती है।   ​पिता का साया उठने के बाद टूटा नहीं हौसला ​गरिमा मूल रूप से एक व्यावसायिक परिवार से संबंध रखती हैं। उनके पिता मनोज लोहिया, जो थोक साड़ी के व्यवसाय से जुड़े थे, का वर्ष 2015 में निधन हो गया था। पिता की अचानक मौत के बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और घर की जिम्मेदारियों का स्वरूप बदल गया। ऐसे विकट और मुश्किल हालातों में उनकी माँ सुनीता देवी ने परिवार को संभाला और अपनी बेटी के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया। उन्होंने अकेले ही अपने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी उठाई और गरिमा की हर कदम पर ढाल बनीं।   ​माँ का सपना और बेटी का ...

जनांदोलन, कारोबार और लोकतंत्र: शिवानंद तिवारी के नजरिए से 1974 से आज तक की एक पड़ताल।

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  पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी द्वारा हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित इंडिया गठबंधन की रैली और 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन के संदर्भ में दिए गए बयान ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरी और विचारणीय बहस छेड़ दी है। आज जब भी कोई बड़ा राजनीतिक आयोजन या जनांदोलन होता है, तो उसका विरोध करने वाले सबसे पहले आर्थिक नुकसान का पैमाना सामने ले आते हैं। लेकिन क्या लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर व्यापारिक नुकसान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? आइए इस पूरे वैचारिक परिप्रेक्ष्य को विस्तार से समझें। 1. रामलीला मैदान की रैली और कारोबारी नुकसान का मुद्दा हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली को लेकर यह सवाल उठाया गया कि इसके कारण राजधानी के बाजारों में हजारों करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित हुआ। आलोचकों का तर्क था कि दिवाली और करवाचौथ की खरीदारी के लिए निकले लोग बाजार नहीं पहुंच सके, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ। शिवानंद तिवारी ने इस दावों पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा विरोधाभास उजागर किया है। उन्होंने कहा कि नुकसान का यह अनुमान कितना सही है,...

कृत्रिम मेधा (AI) और शोध की दुनिया: बौद्धिक ईमानदारी और मौलिकता पर मंडराता संकट।

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  एक समय था जब शोधार्थियों को अकादमिक दक्षता प्राप्त करने के लिए पुस्तकालय-दर-पुस्तकालय भटकना पड़ता था, सामग्री संकलित करनी पड़ती थी और सैकड़ों शोध-प्रबंधों तथा पुस्तकों का गहन अध्ययन करना पड़ता था. लेकिन आज के इस तकनीकी युग में कृत्रिम मेधा (AI) की सहायता से पूरा शोध-प्रबंध कुछ ही घंटों में तैयार किया जा सकता है.    इस बदलाव के कारण शोधार्थी को अब पहले जैसी मेहनत करने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती. परिणामस्वरूप, भारतीय भाषाओं के शोधों में बौद्धिक ईमानदारी और अकादमिक नैतिकता जैसे मूल्य स्थापित होने से पहले ही क्षीण होते दिखाई दे रहे हैं. यदि शोध के लिए अध्ययन और मौलिक चिंतन की जगह कृत्रिम मेधा ले लेगी, तो मानव की मौलिक रचनात्मकता का ह्रास होना तय है. आज यह एक व्यापक चिंता का विषय बनना चाहिए कि तकनीक की दौड़ में कहीं हम अपने मौलिक ज्ञान और बौद्धिक मूल्यों को न खो दें.    #कृत्रिममेधा #ArtificialIntelligence #शोध #ResearchEthics #मौलिकता #AcademicIntegrity #भारतीयभाषाएँ #AIandEducation #ResearchCulture

नीतीश-भाजपा गठबंधन में बढ़ती रस्साकशी: तिरहुत एमएलसी चुनाव और गठबंधन धर्म पर बड़े सवाल।

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   ​बिहार की राजनीति में एक बार फिर सहयोगी दलों के बीच आंतरिक खींचतान और अविश्वास की परतें उधड़ने लगी हैं। हाल ही में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद (MLC) चुनाव और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम ने एनडीए (NDA) के भीतर समन्वय और "गठबंधन धर्म" की सुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्दलीय जीतकर आए दो एमएलसी—बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज—का सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना और खास तौर पर बंशीधर ब्रजवासी द्वारा एनडीए के ही घटक दल जदयू (JDU) के उम्मीदवार अभिषेक झा को पराजित करना, सिर्फ एक चुनावी जीत-हार नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए गहरी चिंता का विषय है। ​अपनों से ही मुकाबला: क्या यह गठबंधन धर्म का खुला उल्लंघन है? ​राजनीति में गठबंधन केवल सीटों का सौदा नहीं होता, बल्कि एक वैचारिक और व्यावहारिक तालमेल होता है। जब एक ही गठबंधन (NDA) के भीतर दो प्रमुख दल—भाजपा और जदयू—आपसी सहमति से एक साझा उम्मीदवार (इस मामले में जदयू के अभिषेक झा) को मैदान में उतारते हैं, और उसी गठबंधन का एक घटक दल भीतरखाने या परोक्ष रूप से बागी या निर्दलीय उम्मीदवार (बंशी...