जनांदोलन, कारोबार और लोकतंत्र: शिवानंद तिवारी के नजरिए से 1974 से आज तक की एक पड़ताल।
पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी द्वारा हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित इंडिया गठबंधन की रैली और 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन के संदर्भ में दिए गए बयान ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरी और विचारणीय बहस छेड़ दी है। आज जब भी कोई बड़ा राजनीतिक आयोजन या जनांदोलन होता है, तो उसका विरोध करने वाले सबसे पहले आर्थिक नुकसान का पैमाना सामने ले आते हैं। लेकिन क्या लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर व्यापारिक नुकसान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? आइए इस पूरे वैचारिक परिप्रेक्ष्य को विस्तार से समझें।
1. रामलीला मैदान की रैली और कारोबारी नुकसान का मुद्दा
हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली को लेकर यह सवाल उठाया गया कि इसके कारण राजधानी के बाजारों में हजारों करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित हुआ। आलोचकों का तर्क था कि दिवाली और करवाचौथ की खरीदारी के लिए निकले लोग बाजार नहीं पहुंच सके, जिससे व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ।
शिवानंद तिवारी ने इस दावों पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा विरोधाभास उजागर किया है। उन्होंने कहा कि नुकसान का यह अनुमान कितना सही है, यह तो स्पष्ट नहीं, लेकिन इस पर संदेह इसलिए भी गहरा जाता है क्योंकि उसी दौरान सत्ताधारी दल के नेताओं के व्यस्त बाजारों में कार्यक्रम हुए, जिनके कारण भी कारोबार पर असर पड़ा होगा। ऐसे में केवल एक राजनीतिक आयोजन को लेकर नुकसान का रोना रोना और दूसरे आयोजनों पर चुप्पी साधना सरासर भेदभावपूर्ण है।
2. 1974 का जेपी आंदोलन और ऐतिहासिक बिहार बंद की यादें
इस पूरे प्रसंग ने श्री तिवारी को 1974 के लोकनायक जयप्रकाश (जेपी) आंदोलन के उन दिनों की याद दिला दी, जब अक्टूबर महीने में तीन दिनों का ऐतिहासिक बिहार बंद बुलाया गया था।
सिनेमा हॉल मालिकों की चिंता: उस दौरान सिनेमा हॉल मालिकों का एक प्रतिनिधिमंडल जेपी से मिलने पहुंचा था। उनका कहना था कि तीन दिनों के बंद से गरीब मजदूरों और कर्मचारियों की आजीविका प्रभावित होगी, इसलिए सिनेमा हॉल को बंद से मुक्त रखा जाए।
क्रांति का प्रभाव सब पर पड़ता है: उस समय शिवानंद तिवारी ने जेपी के सामने यह बात रखी कि यदि संपूर्ण क्रांति या व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष होना है, तो उसका असर हर वर्ग पर पड़ेगा। ऐसा संभव नहीं कि सभी लोग अपने घरों में आराम से बैठे रहें और क्रांति हो जाए। जेपी ने इस बात का समर्थन किया और बंद को यथावत रखा गया।
सन्नाटा और जनसमर्थन: जेपी के आह्वान पर भभुआ, रोहतास, डेहरी, बिक्रमगंज, पीरो और बिहिया जैसे क्षेत्रों में जीटी रोड जैसी व्यस्त सड़कों पर भी पूर्ण सन्नाटा पसर गया था। यह किसी सांगठनिक बल का नहीं, बल्कि जेपी के नेतृत्व और जनता के अटूट विश्वास का परिणाम था।
3. जनांदोलन का मूल्यांकन: बाजार बनाम लोकतंत्र
शिवानंद तिवारी का स्पष्ट मानना है कि किसी भी जनांदोलन का मूल्यांकन केवल बाजार के मुनाफे या नुकसान के तराजू पर नहीं किया जा सकता। आज के दौर में जब देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती मिल रही हो, अधिनायकवाद की प्रवृत्तियां बढ़ रही हों और संसाधन कुछ ही लोगों के हाथों में सिमटते जा रहे हों, तब जनता मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती।
वोट के अधिकार की रक्षा: नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक हथियार उनका वोट है। यदि पांच साल में मिलने वाले इस अधिकार को भी स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से इस्तेमाल करने से वंचित किया जाने लगे, तो जनता की बेचैनी स्वाभाविक है।
युवाओं और महिलाओं की भूमिका: आज के इस युवा उभार में लड़कियां जिस साहस और प्रतिबद्धता के साथ नेतृत्व कर रही हैं, वह यह साबित करता है कि देश का युवा अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह सजग है।
आपद्धर्म के रूप में संघर्ष: आज का यह संघर्ष केवल वैचारिक नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को बचाने की सीधी लड़ाई है। बाजार का कारोबार और नुकसान की भरपाई तो समय के साथ हो सकती है, लेकिन एक बार यदि लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रताएं नष्ट हो जाएं, तो उनकी भरपाई करना असंभव हो जाता है।
शिवानंद तिवारी का यह विश्लेषण हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आर्थिक आंकड़े और व्यापारिक फायदे-नुकसान अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे देश के मूल लोकतांत्रिक ताने-बाने और नागरिकों के अधिकारों से बढ़कर नहीं हो सकते। रामलीला मैदान की भीड़ और युवाओं की बेचैनी को केवल व्यापारिक घाटे के चश्मे से देखना लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा को नजरअंदाज करने जैसा है।
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