नीतीश-भाजपा गठबंधन में बढ़ती रस्साकशी: तिरहुत एमएलसी चुनाव और गठबंधन धर्म पर बड़े सवाल।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर सहयोगी दलों के बीच आंतरिक खींचतान और अविश्वास की परतें उधड़ने लगी हैं। हाल ही में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद (MLC) चुनाव और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम ने एनडीए (NDA) के भीतर समन्वय और "गठबंधन धर्म" की सुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्दलीय जीतकर आए दो एमएलसी—बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज—का सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना और खास तौर पर बंशीधर ब्रजवासी द्वारा एनडीए के ही घटक दल जदयू (JDU) के उम्मीदवार अभिषेक झा को पराजित करना, सिर्फ एक चुनावी जीत-हार नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए गहरी चिंता का विषय है।
अपनों से ही मुकाबला: क्या यह गठबंधन धर्म का खुला उल्लंघन है?
राजनीति में गठबंधन केवल सीटों का सौदा नहीं होता, बल्कि एक वैचारिक और व्यावहारिक तालमेल होता है। जब एक ही गठबंधन (NDA) के भीतर दो प्रमुख दल—भाजपा और जदयू—आपसी सहमति से एक साझा उम्मीदवार (इस मामले में जदयू के अभिषेक झा) को मैदान में उतारते हैं, और उसी गठबंधन का एक घटक दल भीतरखाने या परोक्ष रूप से बागी या निर्दलीय उम्मीदवार (बंशीधर ब्रजवासी) को समर्थन देकर अपने ही सहयोगी दल के प्रत्याशी को हरा देता है, तो इसे राजनीतिक कूटनीति कहें या धोखेबाजी, यह बड़ा सवाल है।
इस घटना ने जदयू के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। सवाल यह है कि क्या भाजपा ने सोची-समझी रणनीति के तहत अपने ही गठबंधन के सहयोगी को कमजोर किया? यदि एनडीए के भीतर ही इस तरह की 'फ्रेंडली फाइट' और भीतरघात होने लगे, तो यह गठबंधन की दीर्घायु और स्थायित्व के लिए खतरे की घंटी है।
जदयू उम्मीदवार का भविष्य और राजनीतिक हताशा
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा आघात जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा और उनकी पार्टी को लगा है। एनडीए समर्थित उम्मीदवार होने के बावजूद अपनों के ही असहयोग या अंदरूनी रणनीतिक मार के कारण पराजय का मुंह देखना पड़ा।
राजनीतिक हाशिए पर जाने का डर: इस हार से जदयू के भीतर मनोबल गिरा है और पार्टी कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया है कि एनडीए में रहते हुए भी उनके हितों की रक्षा सुरक्षित नहीं है।
भविष्य की भूमिका: पराजित हुए जदयू उम्मीदवार के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि क्या उनकी अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उनके समर्थन में उतनी ताकत झोंकी जितनी जरूरत थी, या फिर उन्हें भाजपा की सियासी चाल का मोहरा बना दिया गया?
अतीत के जख्म और वर्तमान का अविश्वास
बिहार की राजनीति में यह कोई पहली बार नहीं है जब भाजपा और नीतीश कुमार के रिश्तों में तनाव देखा गया हो। अतीत में भी कई ऐसे मौके आए हैं जब भाजपा ने रणनीतिक रूप से जदयू को कमजोर करने के प्रयास किए हैं। अतीत में नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करने और राजनीतिक समीकरणों के फेरबदल के जो अनुभव रहे हैं, वे आज भी जदयू के मन में अविश्वास की धुंध पैदा करते हैं।
यदि भाजपा इसी प्रकार अपने सहयोगियों के वोट बैंक और सीटों पर सेंधमारी करती रही और अपने पाले में निर्दलीयों को मिलाकर अपनी ताकत बढ़ाती रही, तो यह रिश्ता लंबे समय तक सहज नहीं रह सकता। गठबंधन धर्म की धज्जियां उड़ाकर यदि कोई दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश करता है, तो उसका अंत वैचारिक और व्यावहारिक अलगाव पर ही होता है।
बंशीधर ब्रजवासी ने शिक्षकों के मुद्दों को उठाने और मुख्यमंत्री/उपमुख्यमंत्री स्तर पर समाधान का भरोसा मिलने का हवाला देकर भाजपा की सदस्यता भले ही ले ली हो, लेकिन इससे यह छुपाया नहीं जा सकता कि यह जीत एनडीए की एकता की जीत नहीं, बल्कि उसके भीतर के अंतर्विरोधों का जीता-जागता प्रमाण है। यदि समय रहते एनडीए नेतृत्व ने इस पर लगाम नहीं लगाई, तो यह आपसी अविश्वास बिहार की सियासत में एक बड़े भूचाल का कारण बन सकता है।
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