राजनीतिक भाषा का दोहरा मानदंड और समाज का दर्पण!
सभ्यता और भाषा के इतिहास में अशिष्टता कोई नया अध्याय नहीं है। बदलाव केवल जन-मानस की स्मृति और सुविधा अनुसार चुनी गई प्रतिक्रियाओं में आया है। भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती; उसमें उस दौर की मानसिकता, समाज के द्वंद्व और राजनीतिक संस्कृति की स्पष्ट छाप होती है।
अतीत के पन्नों को पलटें तो सत्ता और शीर्ष नेताओं के विरुद्ध उग्र और व्यक्तिगत कटाक्ष कोई अनहोनी घटना नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में जब सार्वजनिक मंचों या जन-संचार माध्यमों पर सत्ता-शीर्ष के विरुद्ध तीखी टिप्पणी या नारे गूँजते थे, तब समाज उन्हें भावी पीढ़ी के 'संस्कारों के पतन' के रूप में देखने के बजाय राजनीतिक माहौल की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानता था। आपातकाल के दौर में लगे अश्लील नारे हों या बोफोर्स प्रकरण के समय गूँजती उक्तियाँ, बच्चों ने उन शब्दों को गढ़ा नहीं था, बल्कि केवल उस माहौल से उधार लिया था जिसमें वे सांस ले रहे थे। बच्चे या युवा स्वयं भाषा का सृजन नहीं करते, वे केवल अपने परिवेश का प्रतिध्वनित रूप होते हैं।
अतीत में जब व्यंग्य और तीखे आक्रमण राजनीतिक बहस का हिस्सा थे, तब उन्हें लोकतंत्र के स्वाभाविक उग्र रूप के तौर पर देखा जाता था। समाचार पत्र निष्पक्ष रूप से रिपोर्टिंग करते थे और जनता भी शब्दों के पीछे की राजनीतिक आक्रामकता को समझती थी।
किंतु आज परिदृश्य बदल चुका है। वर्तमान दौर में यदि कोई युवा या बालक आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करता है, तो तत्क्षण पूरी पीढ़ी की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह विडंबना ही है कि समस्या शब्द में नहीं, बल्कि इस बात में तलाशी जाती है कि वह किसके विरुद्ध प्रयुक्त हुआ है।
यदि अतीत के आपत्तिजनक नारों पर चुप्पी साधी गई, यदि मीडिया और जन-विमर्श में विरोधी पक्ष के लिए अपमानजनक शब्दावली के प्रयोग पर तालियाँ बजाई गईं, तो आज अचानक जागृत हुई यह नैतिक चिंता एक दोहरे मापदंड का संकेत देती है। जब टीवी की बहसों, जनसभाओं और सोशल मीडिया के मंचों पर नेताओं के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल होता है, तो वह भी उसी सांस्कृतिक ताने-बाने को दूषित करता है।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि नई पीढ़ी क्या बोल रही है; प्रश्न यह है कि उसने यह भाषा कहाँ से सीखी? जब अशिष्टता को राजनीतिक सुविधा के अनुसार 'सही' या 'गलत' की श्रेणी में बाँट दिया जाता है, तब पतन भाषा का नहीं, बल्कि सामाजिक ईमानदारी का होता है। सिद्धांतों की कसौटी व्यक्ति-विशेष के आधार पर नहीं बदलनी चाहिए। यदि अमर्यादित भाषा गलत है, तो वह हर दौर में और हर व्यक्ति के लिए समान रूप से गलत होनी चाहिए।
लोकतंत्र की जीवंतता तर्क और संवाद से समृद्ध होती है, न कि आक्रामकता और व्यक्तिगत लांछनों से। पीढ़ियाँ रातों-रात असंस्कारी नहीं होतीं; वे तो केवल अपने समय के प्रौढ़ समाज का दर्पण होती हैं। दर्पण पर क्रोध प्रकट करने से चेहरा नहीं बदलता। किसी पीढ़ी की भाषा पर सवाल उठाने से पहले समाज को अपने द्वारा रचे गए संवाद के स्तर का अवलोकन करना होगा।

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