समय की कसौटी पर खरा: समकालीन संदर्भ में प्रेमचंद का शब्द-संसार!
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साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।"
— मुंशी प्रेमचंद
हिंदी साहित्य के क्षितिज पर मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जिनकी रचनाधर्मिता समय की सीमाओं को लांघकर हर युग में नई चेतना का संचार करती है। प्रायः कहा जाता है कि महान साहित्य वह है जो अपने समय का दस्तावेज़ होते हुए भी कालजयी हो। प्रेमचंद का साहित्य इसी कसौटी पर शत-प्रतिशत खरा उतरता है। उन्होंने आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व जिस समाज, जिन समस्याओं और जिन मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया, वे समस्याएँ रूप बदलकर आज भी हमारे सम्मुख खड़ी हैं।
1. यथार्थ के धरातल पर किसान और ग्रामीण जीवन
प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम का सिपाही' यूँ ही नहीं कहा जाता; उन्होंने भारतीय गाँव की आत्मा को उसकी पूरी नग्नता और जीवंतता के साथ पहचाना था।
ऋण और शोषण का दुष्चक्र: 'गोदान' का होरी केवल 1936 का एक भारतीय किसान नहीं है, बल्कि वह आज भी कर्ज़ के बोझ तले दबे, मौसम की मार झेलते और बाज़ार व्यवस्था के हाथों शोषित होते हर अन्नदाता का प्रतीक है।
महाजनी सभ्यता की निरंतरा: आज भले ही 'महाजन' का स्थान बैंक और निजी फाइनेंस कंपनियों ने ले लिया हो, लेकिन किसान की बेबसी और व्यवस्थागत उपेक्षा का यथार्थ आज भी उतना ही टीस पैदा करने वाला है।
2. मानवीय संवेदनाएँ और रिश्तों की गर्माहट
आज का समाज जहाँ तीव्र बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद और एकाकीपन की जकड़ में है, वहीं प्रेमचंद की कहानियाँ हमें आत्मीयता और नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाती हैं।
'ईदगाह' का हामिद: वह केवल एक बालक नहीं, बल्कि त्याग और परिपक्वता का अमर उदाहरण है। खिलौनों और मिठाइयों के आकर्षण को दरकिनार कर अपनी बूढ़ी दादी के लिए चिमटा खरीदने वाला हामिद आज के उपभोक्तावादी युग को 'ज़रूरत और चाहत' के बीच का अंतर सिखाता है।
'पंच परमेश्वर' का न्यायबोध: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि न्याय की कुर्सी पर बैठकर व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठना ही सच्चे लोकतंत्र और नैतिक समाज की नींव है।
3. स्त्री विमर्श और सामाजिक चेतना
प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों और कहानियों में स्त्रियों को केवल सहानुभूति की पात्र नहीं बनाया, बल्कि उनकी मानसिक पीड़ा, सामाजिक बंदिशों और उनके अनकहे संघर्ष को सामने रखा।
'निर्मला' और 'सेवासदन': अनमेल विवाह, दहेज प्रथा और स्त्री के आर्थिक परावलंबन के जिन प्रश्नों को उन्होंने 'निर्मला' में उठाया, वे आज भी भिन्न रूपों में समाज में मौजूद हैं।
नैतिक संबल: प्रेमचंद का स्त्री विमर्श सतही नारेबाजी से परे स्त्री की गरिमा, स्वाभिमान और सामाजिक अधिकार की वकालत करता है।
4. भ्रष्टाचार के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध
आज जब समाज में मूल्य-हीनता और भ्रष्टाचार एक आम बात बनती जा रही है, तब प्रेमचंद की कहानियाँ एक नैतिक दिशा-निर्देश का काम करती हैं।
'नमक का दरोगा': वंशीधर का चरित्र आज के प्रशासनिक अधिकारियों और नागरिकों के लिए एक कसौटी है—जहाँ धन-बल और सत्ता के प्रलोभन के सामने कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की विजय होती है।
'पूस की रात': हलकू की लाचारी और जबरा कुत्ते की वफ़ादारी समाज की उस विषमता पर करारा प्रहार करती है, जहाँ कड़ाके की ठंड में मेहनत करने वाले के पास तन ढकने को कपड़ा नहीं होता।
प्रेमचंद का साहित्य केवल इतिहास का अध्ययन नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने की एक जीवंत प्रयोगशाला है। जब तक समाज में विषमता, शोषण, संवेदनहीनता और नैतिक गिरावट रहेगी, तब तक मुंशी प्रेमचंद की कालजयी लेखनी हर पाठक के विवेक को झकझोरती रहेगी और राह दिखाती रहेगी।

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