भारत में बढ़ते अति-अमीर और कर व्यवस्था का बदलता परिदृश्य!

 




भारत की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण और संरचनात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 576 करदाताओं ने ₹100 करोड़ से अधिक की आय घोषित की है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-तिहाई (एक तिहाई से अधिक) की वृद्धि दर्शाता है। यह रुझान न केवल देश में 'सुपर-रिच' यानी उच्च आय वर्ग की बढ़ती संख्या को रेखांकित करता है, बल्कि देश की आयकर व्यवस्था की बढ़ती पारदर्शिता और विश्वसनीयता को भी साबित करता है।

अति-अमीरों की संख्या में यह इजाफा इस बात का प्रमाण है कि देश में कर संरचना व्यावहारिक और पारदर्शी बन रही है। यह उन तर्कों का खंडन करता है कि अति-अमीर करों के बोझ से बचने के लिए देश छोड़ रहे हैं। आयकर विभाग की कठोर निगरानी, डिजिटल प्रक्रियाओं और सरलीकृत व्यवस्थाओं ने करदाताओं को खुलकर आय घोषित करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

हालाँकि, केवल अति-अमीरों का दायरा ही नहीं बढ़ा है, बल्कि आयकर रिटर्न दाखिल करने वाले सामान्य नागरिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 6 से 8 प्रतिशत आबादी आयकर रिटर्न दाखिल करती है, लेकिन उच्च आय सीमा  के कारण वास्तव में केवल 2.6 प्रतिशत लोग ही प्रत्यक्ष कर का भुगतान करते हैं। यह व्यवस्था भारतीय कर प्रणाली के प्रगतिशील स्वरूप को दर्शाती है, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग पर सीधा कर का बोझ कम रहता है।

कर आधार और आय घोषणा में वृद्धि का एक प्रमुख कारण अर्थव्यवस्था का तेजी से होता औपचारिकीकरण है। अब आय, उपभोग और बचत नियमित एवं औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। औपचारिकीकरण से न केवल वित्तीय पारदर्शिता बढ़ती है, बल्कि पूंजी तक पहुँच आसान होती है।

सरकार के लिए इसका सीधा लाभ यह है कि वह लक्षित कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है। इसके अलावा, कर का दायरा व्यापक होने से सरकार पर कर की दरों को कम रखने का अनुकूल चक्र बनता है।

इन उपलब्धियों के बावजूद, भारत को प्रत्यक्ष कर संग्रह के मामले में अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। केवल शीर्ष आय वर्ग में वृद्धि होना ही पूरी अर्थव्यवस्था की मजबूती का पैमाना नहीं हो सकता।

कर का दायरा वास्तव में तब व्यापक होगा जब देश में 'वास्तविक मजदूरी'  की दर में तेजी से वृद्धि होगी। पिरामिड के शीर्ष (अति-अमीरों) के साथ-साथ पिरामिड का निचला आधार (आम श्रमिक और मध्यम वर्ग) भी मजबूत होना अनिवार्य है। जब आम जनता की आय का स्तर बढ़ेगा, तभी देश का कर आधार स्वाभाविक और स्थायी रूप से विस्तृत हो सकेगा।

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