रंग-तरंग: जब खगौल के मंच पर 'गबरघिचोर' के साथ जीवंत हो उठी भिखारी ठाकुर की लोक-संस्कृती - प्रो. प्रसिद्ध कुमार की आँखों देखी !
पटना/खगौल। रविवार की शाम खगौल का नवनिर्मित सृजन प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। मौका था भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के कालजयी लोकनाट्य 'गबरघिचोर' के प्रभावशाली मंचन का। चर्चित नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा प्रस्तुत इस नाटक को देखने के लिए दर्शकों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि हॉल खचाखच भर गया। आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस यह प्रेक्षागृह किसी बड़े थिएटर या मॉल से कम नहीं लग रहा था—मखमली फर्श, आरामदायक सीटें, शानदार लाइट-साउंड व्यवस्था और दीवारों पर उकेरी गई खूबसूरत चित्रकारी ने रंगकर्म के माहौल को और भी भव्य बना दिया था।
गरिमामय शुरुआत और सम्मान
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और एक विशेष पुस्तिका के विमोचन के साथ हुई। उपस्थित सभी अतिथियों को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
फ्रंट सीट पर बैठकर नाटक का आनंद ले रहे अतिथियों में जेएनएल कॉलेज की प्राचार्य सह प्रख्यात साहित्यकार प्रो. (डॉ.) मधु प्रभा सिंह पूरी तन्मयता के साथ कलाकारों का हौसला बढ़ा रही थीं। एक महिला और साहित्यकार के नाते मंच पर उकेरी जा रही स्त्री-वेदना उनके दिल को छू रही थी। वहीं पास में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ, दानापुर रेलवे के वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी (Sr. DPO) अतुल कुमार, एपीओ और रेलवे के अन्य वरिष्ठ अधिकारी पूरे मनोयोग से इस लोकगाथा के साक्षी बने।
पलायन का दंश और स्त्री-पीड़ा का जीवंत दस्तावेज
निर्देशक नवाब आलम की परिकल्पना में तैयार यह नाटक ग्रामीण भारत की उस कड़वी सच्चाई पर प्रहार करता है, जहाँ रोजी-रोटी की तलाश में पुरुषों का पलायन महिलाओं को अकेले संघर्ष करने पर मजबूर कर देता है। सामाजिक उपेक्षा और विपरीत परिस्थितियों के बीच जन्मा 'गबरघिचोर' जब बड़ा होता है, तो समाज उसे 'अवैध' का तमगा देकर विवाद को पंचायत की चौखट तक ले जाता है।
जब पंचों के अमानवीय फैसले पर भारी पड़ी 'मां की ममता'
नाटक का सबसे मार्मिक दृश्य वह था जब पंचों ने विवाद सुलझाने में नाकाम रहने पर बच्चे को तीन टुकड़ों में काटने (बांटने) का निर्मम फरमान सुना दिया। इस अमानवीय फैसले के सामने मां की ममता चीख उठी—उसने बच्चे की जान बचाने के लिए अपने अधिकार का त्याग कर उसे दूसरों को सौंपने की गुहार लगाई। मां का यह निस्वार्थ त्याग और करुणा देखकर पंचों की आँखें खुल गईं और अंततः न्याय 'गलीज बहू' के पक्ष में हुआ।
कलाकारों का सशक्त अभिनय और लोक-संगीत का जादू
मंच पर पूर्व मध्य रेलवे की कमर्शियल क्लर्क सीपी सिंह (सिंपी सिंह) ने ग्रामीण पहनावे (साड़ी) में 'गलीज बहू' का किरदार इस तरह जीवंत किया कि दर्शकों की आँखें नम हो गईं। भिखारी ठाकुर का नाटक बिना गीतों के अधूरा माना जाता है; बैकग्राउंड से गूंजते कोरस के लोकगीतों ने पूरे प्रेक्षागृह को बांधे रखा।
पंच: मिथिलेश कुमार पांडेय
गलीज बहू: सिंपी सिंह (सीपी सिंह)
गलीज: मुकेश कुमार
गड़बड़ी: अमन कुमार
गबरघिचोर: कुंदन कुमार
जल्लाद: प्रेम प्रकाश सैनिक
रूप-सज्जा: जयप्रकाश मिश्र
संगीत टीम: अखिलेश सिंह, लवकुश कुमार, अभिजीत कुमार, शशि भूषण शर्मा, सऊद आलम, भोला सिंह, आसिफ हसन, राजीव रंजन त्रिपाठी, हुस्ना फातिमा और संजय गुप्ता।
एक यादगार शाम का समापन
कार्यक्रम में डॉ. अनु कुमारी (पूर्व अध्यक्ष, नगर परिषद दानापुर), मनीष कुमार, दीनानाथ प्रसाद यादव, अस्तानंद, सोएब कुरैसी, तनवीरुल हक, पप्पू कुमार, मो. सादिक, जीशान आलम, दयानंद राय, सुनील कुमार , इंद्रदेव प्रसाद
सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का कुशल संयोजन प्रो. प्रसिद्ध कुमार द्वारा किया गया, जिन्होंने अंत में सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।
कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी और ईस्ट सेंट्रल रेलवे द्वारा कला-संस्कृति को दिए गए इस आधुनिक मंच ने यह साबित कर दिया कि आज भी लोक-नाट्य और भिखारी ठाकुर की रचनाएं दर्शकों के दिलों पर राज करती हैं।
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