आई लव यू खगौल! जलमग्न पथ, रेलवे का चकमा और एक भीगे शहर की प्रेमकथा — प्रो. प्रसिद्ध कुमार का एक रिपोर्ताज।
दानापुर रेलवे की चक्करघिनी!
जून की २५वीं तारीख़ थी और घड़ी में शाम के ठीक पाँच बज रहे थे। अंबर की नीलिमा को चीरते हुए कजरारे मेघों का एक घटाटोप घिर आया था। हवाएँ पूरे शबाब पर थीं, मानो प्रकृति किसी महातांडव की भूमिका रच रही हो। मैं अपनी जीवनसंगिनी के साथ दानापुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या ४ पर खड़ा था। नियति का खेल तो देखिए, इससे पहले वाली ट्रेन केवल इसलिए छूट गई क्योंकि उसका प्रस्थान प्लेटफॉर्म संख्या १A से होना मुक़र्रर हुआ था।
अभी हम उस दंश से उबर ही रहे थे कि उद्घोषक (अनाउंसर) की देववाणी गूंजी—"दानापुर-झाझा पैसेंजर प्लेटफॉर्म संख्या १A से रवाना होगी।"
रेलवे की लीला अपरंपार है! प्लेटफॉर्म संख्या ४ से १A की यात्रा करना किसी ओलंपिक भारोत्तोलक या मल्ल-योद्धा के पुरुषार्थ से कम नहीं। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा का रेलवे प्रशासन के लिए वही मोल है, जो पतझड़ में सूखे पत्तों का। आधा किलोमीटर की इस मैराथन दौड़ में रेलवे का धर्म केवल घोषणा करना है, यात्री पहुँचे या पस्त हो जाए—इससे साहिबान को क्या सरोकार?
इंद्रदेव की असीम अनुकंपा बरस रही थी। तन-मन जलधाराओं में सराबोर होता रहा और हम किसी तरह १A की शरण में पहुँचे। पत्नी पटना की ओर प्रस्थान कर गईं और मैं अपनी कर्मभूमि-गृहभूमि खगौल की ओर लौट पड़ा।
नरक कुंड में मैरीन ड्राइव की अनुभूति
असली महाकाव्य तो अभी लिखा जाना बाकी था। जैसे ही मैं बालिगा स्कूल के समीप पहुँचा, सड़क नहीं, एक उद्दाम तरंगिणी (नदी) मेरा स्वागत कर रही थी। ठेहुने (घुटने) भर गंदे और दुर्गंधयुक्त जल में चरणकमल धरने पड़े। मेरे परिधान (पैंट) ने भी चोली-दामन की भांति इस जल-विहार में मेरा अंत तक वफादारी से साथ निभाया—पूरा भीगकर चिपके रहने की कसम खाई!
मोती चौक से ज़रा पहले, उस सड़ते पानी की दुर्गंध के बीच जब ऊपर से बरसती बूंदे और नीचे से उछलता जल परस्पर आलिंगन कर रहे थे, तब अंतरात्मा में एक अलौकिक तरंगे उत्पन्न हुईं। लगा मानो मैं पेरिस की सीन नदी या मुंबई के 'मैरीन ड्राइव' का मुफ़्त लुत्फ़ उठा रहा हूँ!
इसी आत्ममुग्धता और व्यंग्य के अतल प्रवाह में मेरे मुखारविंद से अनायास ही यह प्रेम-मंत्र फूट पड़ा—
"आई लव यू खगौल!"
न ज्वर का दोष, न व्यवस्था की खोट
घर पहुँचते-पहुँचते इस जल-क्रीड़ा का पारितोषिक भी मिल गया—शरीर में हल्का-सा ज्वर (बुखार) उतर आया। प्रातःकाल गोली-सूई का सहारा लेना पड़ा और आज दिन भर केवल एक कप चाय की दिव्य ऊर्जा पर टिके रहकर यह काव्य-रूपी जीवन व्यतीत हो रहा है।
अतः, इस अव्यवस्था, रेलवे के प्लेटफॉर्म-चक्रव्यूह या नगर निगम की इस 'स्विमिंग पूल' योजना के लिए किसी को दोष मत दीजिए। यह तो व्यवस्था का वो शृंगार है जिसे हर नागरिक को सहर्ष स्वीकारना चाहिए।
आइए, मेरे साथ स्वर में स्वर मिलाइए और पूरे समर्पण से बोलिए— "आई लव यू खगौल!"
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