'लीक' होते पेपर, 'बहती' प्रतिमाएं: क्या इसी 'चमकीले भ्रष्टाचार' पर टिका है नया सिस्टम?

 


कहते हैं कि भक्ति में शक्ति होती है, लेकिन हमारी व्यवस्था की भक्ति में गजब की 'कलाकारी' है! यहाँ न तो आस्था अक्षुण्ण है, न युवा का भविष्य सुरक्षित और न ही महापुरुषों का सम्मान। बात चाहे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम पर आए चढ़ावे की हो या अपनी ही विचारधारा के शीर्षमूर्धन्य नेता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृतियों की—जब नीयत में ही खोट हो, तो आस्था हो या परीक्षा का पर्चा, सब 'लीक' होकर सरेआम नीलाम हो जाता है।

जिन्होंने भगवान राम के नाम पर बनी व्यवस्थाओं को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया, उनसे देश के युवाओं या अपने मार्गदर्शकों के प्रति ईमानदारी की उम्मीद रखना ही सबसे बड़ी नासमझी है। एक तरफ तो करोड़ों युवाओं के भविष्य का 'पेपर लीक' करके उनकी बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया जाता है, और दूसरी तरफ 14 लाख रुपये डकार कर तांबे की जगह सीमेंट की मूर्ति पर तांबे का रंग पोत दिया जाता है।

बारिश की पहली ही फुहार क्या पड़ी, नकली तांबे का रंग बह गया और प्रतिमा में आई दरारों ने चिल्ला-चिल्लाकर सिस्टम के भ्रष्टाचार की कहानी बयाँ कर दी। यह सिर्फ वाजपेयी जी की प्रतिमा की दरारें नहीं हैं, यह उस जर्जर व्यवस्था की दरारें हैं जहाँ:

युवा सड़कों पर रो रहा है क्योंकि परीक्षा से पहले ही पर्चा 'लीक' हो जाता है।

महापुरुषों का सम्मान कागजों और सीमेंट के छलावे में 'सड़' रहा है।

और जनता का टैक्स भ्रष्टाचार के नाले में 'बह' रहा है।

जिस नेता को पूरा देश उनकी बेदाग राजनीति के लिए 'अटल' मानता था, उनकी स्मृति के साथ ऐसा घटिया खिलवाड़ और युवाओं के सपनों का यह सौदा दर्शाता है कि आज की राजनीति में न तो राम जी का डर बचा है, न पुरोधाओं का सम्मान और न ही संविधान का भय।

हर जगह बस 'इवेंट' चमकाने का खेल है—चाहे उसके पीछे का ढांचा सीमेंट का हो या खोखले वादों का। 14 लाख की प्रतिमा का रंग और लाखों युवाओं का भविष्य, दोनों ही इस भ्रष्ट सिस्टम की भेंट चढ़ चुके हैं। सवाल यह है कि जनता के सब्र का 'बांध' टूटने से पहले क्या यह खोखला सिस्टम कभी जागेगा?

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