विकसित भारत के लिए केवल विकास नहीं, उत्पादकता है जरूरी!
भारत ने हाल के वर्षों में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद, व्यापक आर्थिक स्थिरता के साथ तेज आर्थिक विकास दर हासिल की है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5% रही, जो इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाती है। हालांकि, वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल इस विकास दर को बनाए रखना काफी नहीं है; इसके लिए सभी क्षेत्रों में उत्पादकता को बढ़ाना और गहरे संरचनात्मक सुधार करना अनिवार्य है।
1. विनिर्माण क्षेत्र: गहराई और पैमाने की कमी
भारत के विकास की कहानी में सेवाओं का योगदान बड़ा रहा है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र उम्मीद के मुताबिक रोजगार पैदा करने और उत्पादकता बढ़ाने में पीछे रह गया है।
असंतुलित ढांचा: भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में बहुत सारी छोटी और कम उत्पादक फर्में हैं, जबकि मध्यम और बड़ी फर्मों की संख्या बेहद कम है। यह स्थिति पूर्वी एशिया के उन देशों के विपरीत है जिन्होंने बड़ी फर्मों के दम पर निर्यात और उत्पादकता में ऐतिहासिक वृद्धि की थी।
अकुशल आवंटन: इस असंतुलन के कारण श्रम का एक बड़ा हिस्सा आज भी कृषि में फंसा हुआ है, जहाँ उत्पादकता विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की तुलना में बहुत कम है। बुनियादी ढांचे में भारी निवेश के बावजूद अभी भी 'क्षमता अंतराल' बना हुआ है।
2. 'जॉम्बी फर्में' और संसाधनों का ठहराव
आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, विकास के लिए पुरानी और कम कुशल फर्मों की जगह नई और अधिक कुशल फर्मों का आना जरूरी है। लेकिन भारत में यह प्रक्रिया काफी धीमी है।
जॉम्बी फर्में (Zombie Firms): ये वे फर्में होती हैं जो आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं बची हैं, लेकिन फिर भी किसी तरह जीवित हैं। ये फर्में देश की पूंजी और श्रम को ऐसे स्थानों पर ब्लॉक कर देती हैं जहाँ उनका सही उपयोग नहीं हो पाता।
'इमर्जिंग मार्केट्स' पर हुए 2025 के एक शोध के अनुसार, संख्या में कम होने के बावजूद ये जॉम्बी फर्में देश के कुल कर्ज और संपत्तियों में एक बड़ा हिस्सा घेर कर बैठी हैं।
वित्तीय कारण: यह समस्या चक्रीय नहीं बल्कि स्थायी है। बैंक-वित्तपोषित फर्में इक्विटी-वित्तपोषित फर्मों की तुलना में अधिक 'जॉम्बी' बनती हैं और उनके उबरने की संभावना कम होती है। वर्तमान नियामक ढांचा अक्षम फर्मों को बाहर निकालने के बजाय उन्हें बनाए रखता है, जिससे उत्पादक फर्मों को ऋण मिलने में दिक्कत होती है।
3. भविष्य की दो-आयामी रणनीति
भारत को 'विकसित भारत' के सपने को सच करने के लिए विनिर्माण पर आधारित एक ऐसी रणनीति की आवश्यकता है जो पैमाने और दक्षता दोनों को संबोधित करे:
वैश्विक एकीकरण और बुनियादी ढांचा: भारतीय विनिर्माण को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से गहराई से जोड़ना होगा, व्यापार बाधाओं को प्रबंधित करना होगा और बुनियादी ढांचे में निवेश जारी रखना होगा।
व्यवसाय में गतिशीलता: अक्षम और घाटे में चल रही फर्मों को आसानी से बाजार से बाहर निकलने का रास्ता देना होगा ताकि संसाधन मुक्त हो सकें।
नियामक सुधार: इसके लिए नियमों को सरल बनाना, श्रम बाधाओं को कम करना, दिवाला प्रक्रियाओं को मजबूत करना, बेहतर ऋण आवंटन और अनुसंधान व विकास को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।
भारत ने तेज आर्थिक विकास की मजबूत नींव रख दी है। लेकिन इस विकास को दीर्घकालिक और टिकाऊ बनाने तथा 'विकसित भारत' की छलांग लगाने के लिए उत्पादकता में सुधार और अक्षम फर्मों का बाजार से बाहर निकलना ही निर्णायक कारक साबित होगा।
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