लोकतंत्र की शुचिता बनाम 'बहुमत की तानाशाही'!
चयन समिति की निष्पक्षता पर सुलगते सवाल!
लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता उसकी रीढ़ होती है। यदि रीढ़ की हड्डी ही कमजोर या झुकी हुई हो, तो लोकतांत्रिक ढांचा ढहने में देर नहीं लगती। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर जो टिप्पणियां की हैं, वे न केवल सरकार की मंशा पर सवाल उठाती हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति एक गंभीर चेतावनी भी हैं।
1. चयन समिति का ढांचा: एक पूर्व-निर्धारित खेल?
वर्तमान कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं। कोर्ट ने इसे "बहुमत की तानाशाही" करार दिया है। तर्क सीधा और स्पष्ट है: तीन सदस्यों वाली समिति में दो सदस्य सत्तापक्ष के (पीएम और उनके द्वारा नामित मंत्री) होने का मतलब है कि विपक्ष के नेता की असहमति का कोई व्यावहारिक मूल्य नहीं रह जाता। निर्णय हमेशा 2:1 के अनुपात में सरकार के पक्ष में ही होगा।
2. 'स्वतंत्र' और 'स्वतंत्र दिखने' के बीच की खाई
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दत्ता की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि "चुनाव आयोग को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।" * जब चयन समिति में सत्तापक्ष का भारी बहुमत हो, तो नियुक्त व्यक्ति चाहे कितना भी ईमानदार क्यों न हो, उसकी निष्पक्षता पर संदेह के बादल हमेशा मंडराते रहेंगे।
जनता का विश्वास संस्थानों की कार्यप्रणाली के साथ-साथ उनके गठन की प्रक्रिया पर भी निर्भर करता है।
3. न्यायपालिका को बाहर रखने की विडंबना
पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को इस चयन समिति का हिस्सा बनाया था ताकि संतुलन बना रहे। लेकिन सरकार ने नया कानून लाकर CJI को हटाकर उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को बैठा दिया।
सवाल: जब सीबीआई (CBI) निदेशक की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश शामिल हो सकते हैं, तो चुनाव आयुक्त—जिन पर पूरे देश के चुनावी निष्पक्षता की जिम्मेदारी है—उनकी नियुक्ति में एक निष्पक्ष न्यायिक सदस्य से परहेज क्यों?
4. क्या सत्ता के साथ सिद्धांत बदल जाते हैं?
अदालत ने एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा किया कि हर राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद अपना रुख बदल लेता है। जो दल विपक्ष में रहकर 'संस्थागत स्वायत्तता' की दुहाई देते हैं, सत्ता मिलते ही वे ही दल संस्थानों को अपनी मुट्ठी में रखने का प्रयास करते हैं। यह 'सुविधा की राजनीति' देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
एक कैबिनेट मंत्री से यह उम्मीद करना कि वह चयन प्रक्रिया में अपने ही प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा, व्यावहारिक रूप से असंभव है। यदि चयन समिति में कोई तीसरा 'तटस्थ' व्यक्ति (जैसे मुख्य न्यायाधीश) नहीं है, तो यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान को "सत्तारूढ़ दल की शाखा" बनने से बचाने के लिए इसकी नियुक्ति प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन और वास्तविक निष्पक्षता की अनिवार्य आवश्यकता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है, बल्कि 'निष्पक्ष' चुनाव कराने के भरोसे का नाम है।

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