सत्य का हलाहल और व्यवस्था की चौखट!

   


 

​आदर्शों के अवसान और अकेले संघर्ष की एक मर्मभेदी दास्तान ! 

​अदालतें जब युवाओं को 'परजीवी' या 'तेलचट्टा' कहकर संबोधित करती हैं.

​- एक वैचारिक रिपोर्ताज

​सुकरात का विष और आधुनिक बौनापन

​इतिहास गवाह है कि अमरता की कीमत हमेशा हलाहल पीकर ही चुकाई गई है। सुकरात आज भी जीवित है क्योंकि उसने सच की वेदी पर समझौते का अमृत पीने से इनकार कर दिया था। विडंबना देखिए कि आज का बहुसंख्यक समाज सुबह उठने, कमाने, बच्चों की फीस भरने और ईएमआई (EMI) के चक्रव्यूह में उलझकर केवल सांसें गिन रहा है। इतिहास उन्हें बिसरा देता है जो रीढ़विहीन होकर जीते हैं, और उन्हें याद रखता है जो सच के सामने चट्टान की तरह अड़े रहते हैं।

​चौखट पर झुके सर: कलम का आत्मसमर्पण

​हाल ही में न्यायपालिका की विसंगतियों और भ्रष्टाचार को आठवीं की पाठ्यपुस्तक में शामिल करने वाले तीन शिक्षाविदों का प्रसंग देश के बौद्धिक मानस को झकझोर गया। जब सर्वोच्च अदालत की भृकुटि तनी, नौकरी जाने और भविष्य के सरकारी कार्यों पर प्रतिबंध का संकट आया, तो वे तीनों शीर्ष अदालत की चौखट पर नतमस्तक हो गए। "मीलार्ड! गलती हो गई, माफ कर दीजिए"—इन शब्दों के साथ ही देश की निर्भीक कलम ने भय के आगे घुटने टेक दिए। यह केवल एक माफीनामा नहीं था, बल्कि सच लिखने के उस साहस का जनाजा था, जिसके साथ कभी पूरा प्रबुद्ध समाज खड़ा था। कलम बिकी नहीं, तो कम से कम डर जरूर गई।

​यदि मैं होता: एक काल्पनिक महाआख्यान

​मै इस बिंदु पर आत्मा की गहरी टीस को महसूस करता हूँ । यदि इन डरपोक शिक्षाविदों की जगह कोई जीवंत और आत्मसम्मान से भरा व्यक्ति होता, तो वह माफी की याचना नहीं करता। वह अदालत के आलीशान कमरों में खड़े होकर गरजता:

​"मीलार्ड! मैंने वही लिखा है जो इस देश की चाय दुकानों, चौक -  चौराहों से लेकर वकीलों के चैंबरों की फुसफुसाहट में तैर रहा है। यदि सच लिखना अपराध है, तो मुझे हथकड़ियां पहनाई जाएं, जेल भेजा जाए, आजीवन कारावास दिया जाए, लेकिन मैं अपनी आत्मा का सौदा नहीं करूँगा।"

​भ्रष्टाचार की नई परिभाषा और सत्ता का दोहरा चरित्र

​रिश्वत का लेन-देन ही सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं है। मुकदमों को दशकों तक लटकाए रखना, अपनों को रेवड़ियां बांटना, गरीब की तारीख-दर-तारीख में उम्र खपा देना और सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राज्यसभा की सीट या गवर्नरी का पुरस्कार पा लेना—क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

​अदालतें जब युवाओं को 'परजीवी' या 'तेलचट्टा' कहकर संबोधित करती हैं, तो वे अपनी गरिमा भूल जाती हैं। और जब इस पर जन-आक्रोश भड़कता है, तो कैमरों और रिकॉर्डिंग्स की मौजूदगी के बावजूद यह कहकर मुकर जाना कि "बयान सिर्फ फर्जी डिग्री वालों के लिए था", व्यवस्था के दोहरे चरित्र को नंगा कर देता है।

​समझौते की संस्कृति बनाम आत्मसम्मान की जंग

​सबसे बड़ा आघात उन बुद्धिजीवियों ने दिया है जिन्होंने मजदूरी करके पेट पालने और अपने बच्चों की नजरों में 'नायक' बने रहने के बजाय 'माफीवीर' बनना स्वीकार कर लिया। इस देश में आज समझौता सबसे सस्ता है और आत्मसम्मान सबसे महंगा।

​इस भयावह सन्नाटे के बीच, व्यवस्था के सामने अकेले जूझते संजय सिन्हा जैसे नाम उम्मीद की किरण हैं। एक तरफ समूचा तंत्र है और दूसरी तरफ सत्य की अलख जगाता एक अकेला सिपाही। यह सच की ही ताकत है कि अंततः व्यवस्था को झुकना पड़ा, जजों के खिलाफ विजिलेंस जांच बैठी और सवाल पूछे गए।

​लंबी और रीढ़विहीन जिंदगी से कहीं बेहतर है—आईने में खुद से आंखें मिला पाने की तसल्ली। रोज-रोज तिल-तिल मरने से बेहतर है सच के लिए एक दिन मर जाना। जो सच के लिए फांसी का फंदा चूमते हैं, वे 'भगत सिंह' कहलाते हैं। कायर तो केवल व्यवस्था के बनाए सांचे में वोट देते हैं, वे वास्तव में कभी जीते ही नहीं। ज़िंदा कौन है और मृत कौन, यह इतिहास तय कर चुका है। 


Comments

Popular posts from this blog

अलविदा! एक जन-नेता का सफर हुआ पूरा: प्रोफेसर वसीमुल हक़ 'मुन्ना नेता' नहीं रहे !

एक परिवार की पुकार: रामलड्डू की सकुशल वापसी के लिए सरकार से गुहार !😢प्रो प्रसिद्ध कुमार।

एक गर्मजोशी भरा स्वागत: पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के नए कुलपति ने वित्त रहित शिक्षक महासंघ से की मुलाकात !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।