ज़िंदगी का शायर: बशीर बद्र की याद में एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि!
"आम लोगों के गहरे ज़ख्मों को जीवंत शब्द देने वाले आधुनिक गज़ल के उस्ताद"
आम लोगों के जीवन के गहरे ज़ख्मों को जीवंत और मखमली शब्द देने वाले प्रख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र अब भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी रूह को छू लेने वाली कालजयी शायरी के ज़रिए वे अदब की दुनिया में हमेशा अमर रहेंगे। वे जितने सरल और सहज इंसान थे, उनकी रचनाओं में भी उतनी ही सादगी और तरलता थी। बशीर साहब की लेखनी में इस कदर भाव अभिव्यक्ति होती थी कि हर कोई उनकी पंक्तियों में खुद की ज़िंदगी का अक्स देखता था। आधुनिक गज़ल के इस अज़ीम उस्ताद के रचना संसार में ज़िंदगी का हर वह लम्हा शामिल था, जिसे एक आम इंसान रोज़ जीता है, तड़पकता है और मुस्कुराता है।
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,"
"न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।"
बशीर बद्र अपने शब्दों में तन्हाई, जुदाई और इंसानी पीड़ा को बखूबी उकेरते थे। उनकी गज़लें सीधे दिल पर दस्तक देती थीं। वे चुभती ज़रूर थीं, मगर मन के किसी कोने में एक मरहम बनकर दर्ज हो जाती थीं। वे अपनी शायरी में उस शहर को भी जीते रहे, जहाँ वक़्त के साथ अजनबियत और दूरियाँ बढ़ती चली गईं। उन्होंने नए मिज़ाज के शहरों और इंसानी फितरत को वक़्त रहते पहचान लिया था। संघर्ष भरे रास्तों से गुज़रकर उन्होंने ज़िंदगी की शाम आने से पहले लोगों की जुबान पर चढ़ जाने वाली ऐसी कालजयी पंक्तियाँ रचीं, जो आज भी हर तन्हा और दार्शनिक इंसान का सहारा हैं।
"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,"
"ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।"
बशीर साहब के मशहूर शेरों में समाज के जटिल ताने-बाने के बीच जद्दोजहद करने का एक अनूठा जज़्बा दिखता है। उनकी शायरी सिर्फ़ महफ़िलों की ज़ीनत नहीं है, बल्कि उसमें ज़िंदगी के कई गहरे पाठ छिपे हैं। जब समाज में नफ़रत और दूरियाँ बढ़ती हैं, तब उनकी लिखी पंक्तियाँ इंसानी भाईचारे और मोहब्बत का रास्ता दिखाती हैं।
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,"
"तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।"
हममें से न जाने कितने ऐसे लोग होंगे जो किसी न किसने मौके पर, चाहे वो मोहब्बत का अहसास हो या जुदाई का गम, उनकी शायरी को याद करते रहे हैं और उन्हें दोहराते रहे हैं। जीवन के संवेदनशील उतार-चढ़ाव के वक़्त न जाने कितने मायूस दिलों ने उनकी शायरी को अपना संबल और सहारा बनाया होगा। बशीर बद्र अपने जीवन में जिस मुकाम पर पहुँचे, वहाँ तक पहुँचना कोई आसान सफ़र नहीं था। उन्होंने अपने कठिन परिश्रम और दम पर अपनी पढ़ाई पूरी की और कॉलेज में लंबे समय तक अध्यापन का कार्य किया।
हिंदी और फ़ारसी भाषाओं पर उनकी असाधारण और गहरी पकड़ थी, इसलिए वे कभी खुद को सिर्फ़ उर्दू के दायरे तक सीमित नहीं रख पाए। उनकी सहज भाषा का ही कमाल था कि उनकी कई रचनाओं का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और वे दुनिया भर में मशहूर हुईं। कई बड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों (जैसे पद्म श्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार) से नवाजे जाने के बावजूद बशीर साहब हमेशा बेहद विनम्र और ज़मीन से जुड़े रहे।
"जी बहुत चाहता है सच बोलें,"
"क्या करें हौसला नहीं होता।"
इस नश्वर दुनिया को एक सराय या मुसाफ़िरखाना मानने वाले बशीर बद्र के चले जाने से आज पूरी दुनिया में फैले उनके प्रशंसक और अदब के दीवाने गहरे शोक में हैं। निस्संदेह, साहित्याकाश ने एक ऐसी महान शख्सियत को खो दिया है, जिन्हें आधुनिक शायरी का बेशकीमती नगीना माना जाता था। सच तो यह है कि बशीर बद्र एक ऐसे अद्वितीय शायर थे, जिनके शब्द आज भी अपनी पूरी भावुकता और गहराई लेकर दुनिया भर के करोड़ों दिलों में धड़क रहे हैं और जब तक गज़ल का वजूद रहेगा, बशीर बद्र हमारे ख्यालों में ज़िंदा रहेंगे।

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