शुचिता का सरेंडर: जब परीक्षाओं की सुरक्षा के लिए 'सेना' बुलानी पड़े !
डिजिटल इंडिया के दौर में सिस्टम का सबसे बड़ा 'लॉजिस्टिकल और नैतिक' फेलियर!
किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस देश का प्रशासनिक ढांचा खुद को 'हाई-टेक' और डिजिटल कहता हो, उसे देश के बच्चों की एक परीक्षा कराने के लिए देश की सरहदों की रक्षा करने वाली वायुसेना का सहारा लेना पड़ रहा है। नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक मामले के बाद उपजा यह नया संकट सिर्फ एक परीक्षा के रद्द होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सिस्टम, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और राज्य पुलिस तंत्र के पूरी तरह से पंगु हो जाने का आधिकारिक घोषणापत्र है।
22 लाख सपनों की बलि और 'ऊंची कीमतों' का बाजार
जब परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो सिर्फ एक कागज का टुकड़ा बाहर नहीं आता; बल्कि ईमानदारी से दिन-रात एक करने वाले करीब 22 लाख छात्रों की मेहनत, उनके माता-पिता के त्याग और इस देश की योग्यता (Merit) का खुलेआम सौदा होता है।
भ्रष्ट लेनदेन का खेल: पैसे के दम पर भविष्य खरीदने वाले माफिया आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।
शोर में दबी पीड़ा: पेपर लीक होने के बाद मचे राजनीतिक और प्रशासनिक हल्ले में उन मासूम और ईमानदार छात्रों का दर्द कहीं खो गया है, जिन्होंने बिना किसी शॉर्टकट के अपनी परीक्षा दी थी।
क्या देश का पुलिस और प्रशासनिक तंत्र अक्षम हो चुका है?
सबसे बड़ा और तीखा सवाल सरकार के उस रवैये पर खड़ा होता है, जहां खामियों को दुरुस्त करने और शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के बजाय, समस्या का 'शॉर्टकट' समाधान ढूंढा जा रहा है।
क्या सरकार को अब अपनी ही पुलिस और जांच एजेंसियों पर भरोसा नहीं रहा? अगर देश की चुस्त-दुरुस्त पुलिस और खुफिया तंत्र परीक्षा केंद्रों तक पेपर को सुरक्षित पहुंचाने में भी असमर्थ हैं, तो यह आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक क्षमता पर एक बहुत बड़ा तमाचा है। परीक्षा के आयोजन में वायुसेना (Air Force) को शामिल करने का प्रस्ताव यह स्वीकार करने जैसा है कि सरकार का मौजूदा सिविलियन ढांचा पूरी तरह से सड़ चुका है।
आपदा प्रबंधन और परीक्षा प्रबंधन में फर्क भूल गई सरकार
आमतौर पर सेना या सशस्त्र बलों को प्राकृतिक आपदाओं, युद्ध जैसी आपातकालीन स्थितियों या दंगों को नियंत्रित करने के लिए बुलाया जाता है। लेकिन आज देश में यह 'अफसोसजनक' नौबत आ गई है कि:
बेहतर संसाधन होने के बावजूद...
हर स्तर पर डिजिटल और तकनीकी निगरानी होने के बावजूद...
व्यापक प्रशासनिक अमला होने के बावजूद...
...हम एक प्रश्नपत्र की गोपनीयता बरकरार नहीं रख पा रहे हैं। सेना का काम देश को दुश्मनों से बचाना है, न कि प्रशासनिक निकम्मेपन के कारण लीक होते पेपरों को ढोना।
शुचिता की फिक्र या सिर्फ चेहरा बचाने की कोशिश?
सेना की मदद लेकर 21 जून की परीक्षा को शायद सुरक्षित करवा लिया जाए, लेकिन यह इस गंभीर बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि उस पर लगाया गया एक अस्थायी 'बैंड-एड' है। जब तक पेपर लीक करने वाले गिरोहों को जड़ से नहीं उखाड़ा जाता और परीक्षा कराने वाली नोडल एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक व्यवस्था में 'शुचिता' वापस नहीं आ सकती। सरकार को यह समझना होगा कि सेना की वर्दी के पीछे छिपकर प्रशासनिक नाकामी को ज्यादा दिनों तक नहीं छुपाया जा सकता।

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