​भारत में निर्धनता की स्थिति: एक सतत आर्थिक चुनौती !

    


 आर्थिक संवृद्धि के बीच क्षेत्रीय असमानता और उपभोग व्यय का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

​1.  भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र समष्टि आर्थिक संवृद्धि के बावजूद, 'गरीबी' या 'निर्धनता' एक निरंतर नीतिगत चिंता बनी हुई है। आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए विशेष रूप से कृषि और खनिज-समृद्ध क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

​2. निर्धनता मापन और उपभोग व्यय 

​रंगराजन विशेषज्ञ समूह की सिफारिशें: वर्ष 2011-12 के मूल्यों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹972 और शहरी क्षेत्रों के लिए ₹1,407 प्रति व्यक्ति मासिक व्यय को निर्धनता रेखा माना गया था।

​वर्तमान अनुमानित सीमा: नवीनतम उपभोग व्यय के आधार पर, ग्रामीण क्षेत्रों में यह सीमा ₹2,802 प्रति व्यक्ति प्रति माह (लगभग ₹93.4 प्रति दिन) तथा शहरी क्षेत्रों में ₹3,778 प्रति व्यक्ति प्रति माह (लगभग ₹126 प्रति दिन) आंकी गई है।

​3. प्रमुख सांख्यिकीय आंकड़े एवं प्रवृत्तियाँ 

   वर्तमान समय में देश की कुल आबादी का 26.8% हिस्सा निर्धनता रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहा है।

​ग्रामीण बनाम शहरी विभाजन: ग्रामीण इलाकों में निर्धनता का अनुपात 29% है, जबकि शहरी इलाकों में यह 22% दर्ज किया गया है।

​तेंदुलकर और विश्व बैंक का अनुमान: यदि ₹60 प्रति दिन ($3 क्रय शक्ति समता - PPP) की निचली रेखा को आधार माना जाए, तो देश में निर्धनता दर 2011-12 के 21.9% से घटकर वर्ष 2022-23 में 4.7% और 2023-24 में 2.3% के स्तर पर आने का अनुमान है।

​4. क्षेत्रीय असमानता और 'संसाधन अभिशाप' 

 भारत में निर्धनता का भौगोलिक वितरण अत्यधिक विषम है:

​निर्धन आबादी का सघनता भारत की कुल निर्धन आबादी का 80 प्रतिशत हिस्सा मुख्य रूप से 10 राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, महाराष्ट्र, राजस्थान और ओडिशा) में रहता है। इन राज्यों की संयुक्त आबादी देश की कुल आबादी का 40% से अधिक है।

​"संसाधन अभिशाप" झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों में 45 प्रतिशत से अधिक आबादी निर्धनता रेखा के नीचे है। यह इस आर्थिक विरोधाभास को दर्शाता है कि प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद स्थानीय आबादी का आर्थिक पिछड़ापन बना हुआ है।

​बेहतर प्रदर्शन वाले राज्य: पंजाब, हरियाणा और दक्षिणी राज्यों (जैसे केरल, तमिलनाडु) में कृषि उत्पादकता और सुदृढ़ सामाजिक बुनियादी ढांचे के कारण निर्धनता का अनुपात काफी कम है।

​5. ढांचागत चुनौतियाँ और निर्धनता के मुख्य कारण 

​कृषि पर निर्भरता: जिन क्षेत्रों में जीविकोपार्जन केवल पारंपरिक कृषि पर आधारित है, वहाँ मौसमी बेरोजगारी और कम उत्पादकता के कारण निर्धनता अधिक है।

​कम मजदूरी वाले अनौपचारिक रोजगार: निर्माण  क्षेत्र को छोड़कर अन्य सहायक क्षेत्रों (व्यापार, परिवहन, होटल आदि) में कम मजदूरी वाले अनौपचारिक रोजगारों की अधिकता है, जो श्रमिकों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने में पर्याप्त नहीं हैं।

​6. नीतिगत सुधार और भावी राह 

​आर्थिक रूप से पिछड़े और खनिज-समृद्ध क्षेत्रों में निर्धनता उन्मूलन के लिए निम्नलिखित त्रि-आयामी रणनीति आवश्यक है:

​संस्थागत फंड का सही आवंटन: जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंड का सही उपयोग करके प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), पोषण कार्यक्रम और शिक्षा अवसंरचना को मजबूत किया जाए।

​आर्थिक विविविधीकरण  ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण , लॉजिस्टिक्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSME) को बढ़ावा देकर कृषि पर से निर्भरता कम की जाए।

​सामाजिक सुरक्षा मजबूत करना: 'मूल्य स्थिरीकरण प्रणाली' जैसी कल्याणकारी योजनाओं को सुदृढ़ करना, जिसने पूर्व में आबादी के एक बड़े हिस्से को गरीबी से बाहर निकालने में मदद की है।

भारत को यदि 'विकसित भारत' के वृहद लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो तीव्र आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ समावेशी विकास  पर ध्यान केंद्रित करना होगा, ताकि क्षेत्रीय और ढांचागत असमानताओं को पूरी तरह समाप्त किया जा सके। 

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