थान का कपड़ा और हमारी व्यवस्था: जहाँ मूल्य 'नियम' नहीं, दुकानदार की 'मर्जी' तय करती है !
आधुनिकता और डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ एक ओर हम पारदर्शी बाजार और 'वन नेशन, वन टैक्स' (GST) जैसे बड़े सुधारों का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी जमीनी व्यवस्था की एक ऐसी कड़वी हकीकत है जो आज भी उपभोक्ताओं का मौन शोषण कर रही है। देश के पारंपरिक कपड़ा बाजारों में मिलने वाला 'थान का कपड़ा' (Unstitched Fabric Rolls) इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
1. मूल्य नियंत्रण और पारदर्शिता का अभाव
थान वाले कपड़ों की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि इनमें आम तौर पर प्रति मीटर का कोई निश्चित और स्पष्ट खुदरा मूल्य (MRP) अंकित नहीं होता। यदि कुछ थान के किनारों या टैग पर मूल्य अंकित होता भी है, तो वह केवल थोक व्यापारी या बड़े डीलरों के समझने योग्य कोड भाषा में होता है, जिसे आम क्रेता कभी नहीं समझ पाता। परिणाम यह होता है कि कीमत पारदर्शी होने के बजाय पूरी तरह से गोपनीय बनी रहती है।
2. 'जो मुँह में आया, वही कीमत' – उपभोक्ता की लाचारी
जब किसी उत्पाद पर स्पष्ट और वैधानिक मूल्य अंकित नहीं होता, तो वहाँ बाजार के नियम समाप्त हो जाते हैं और दुकानदार का एकाधिकार शुरू हो जाता है। जहाँ विकल्प सीमित होते हैं या पारदर्शिता कम होती है, वहाँ निर्माता और विक्रेता उपभोक्ताओं से मनमाना मूल्य वसूलते हैं। थान के कपड़े के मामले में दुकानदार ग्राहक के पहनावे, उसकी जरूरत और उसकी मोल-तोल करने की क्षमता को भांपकर कीमत तय करता है। "जो दुकानदार के मुँह में आया, वही कीमत है" — यह महज एक मुहावरा नहीं, बल्कि इस असंगठित बाजार की रोजमर्रा की सच्चाई है।
3. कृत्रिम मूल्य और विज्ञापनों का मायाजाल
कपड़ा उद्योग और ब्रांड्स अक्सर अपने प्रचार अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं। यह प्रचार उपभोक्ताओं की मानसिकता को इस कदर प्रभावित करता है कि वे साधारण से कपड़े के लिए भी कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई कई गुना अधिक कीमत देने को मजबूर हो जाते हैं। उत्पाद की वास्तविक लागत (Production Cost) और उसके खुदरा मूल्य में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
4. प्रशासनिक उदासीनता और उपभोक्ता संरक्षण की विफलता
भारत में 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम' और 'विधिक मापविज्ञान (पैकेज्ड कमोडिटीज) नियम' लागू हैं, जो यह अनिवार्य करते हैं कि हर बेची जाने वाली वस्तु पर उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) स्पष्ट लिखा होना चाहिए। लेकिन थान के कपड़े को "खुली वस्तु" (Loose Commodity) की श्रेणी में रखकर इस नियम के लूपहोल (खामियों) का जमकर फायदा उठाया जाता है। प्रशासन इस लूट को रोकने में पूरी तरह विफल या उदासीन नजर आता है। यह ठीक वैसी ही विसंगति है जैसी जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में देखी गई है, जहाँ सरकार ने राहत देने के लिए कदम तो उठाए लेकिन वह क्षेत्र खुद मूल्य निर्धारण की सबसे बड़ी विसंगति बन गया।
थान वाले कपड़े के बाजार में व्याप्त यह मनमानी हमारी आर्थिक और नियामक व्यवस्था की एक बड़ी नाकामी है। जब तक सरकार थान के कपड़ों पर प्रति मीटर 'स्पष्ट और पठनीय' MRP अनिवार्य नहीं करती और उपभोक्ता अधिकारों का कड़ाई से पालन नहीं कराया जाता, तब तक आम नागरिक इसी तरह ठगा जाता रहेगा। उपभोक्ताओं को भी अब केवल जागरूक होने की नहीं, बल्कि इस संगठित मुनाफाखोरी के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है।

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