बिहार में 'जीरो टॉलरेंस' के रंगमंच पर कमीशन का 'क्लासिक' नाटक! -​प्रो प्रसिद्ध कुमार का एक व्यंग्यात्मक विवेचना!

  


जब बढ़े हुए बिल ईमानदारी का प्रमाणपत्र बन जाएं और व्यवस्था रिश्वत को 'जायज बिजनेस' का सिंदूर लगा दे!


​बिहार की पावन धरती पर इन दिनों 'भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस' का एक बेहद अनूठा और कलात्मक मंचन चल रहा है। इस नाटक के मुख्य निर्देशक हैं—'ऋशु श्री' उर्फ ऋशु रंजन सिन्हा, जो अपनी प्रशासनिक 'महिमा' के कारण आजकल प्रवर्तन निदेशालय (ED) और विशेष निगरानी इकाई (SVU) के मेहमान बने हुए हैं। आम जनता जिसे 'घोटाला' समझकर छाती कूट रही है, दरअसल वह आधुनिक अर्थशास्त्र का एक ऐसा अद्भुत 'सिंडिकेट' मॉडल है, जिस पर हार्वर्ड में रिसर्च होनी चाहिए।

​1. 'जायज बिजनेस' की गंगा में अनैतिकता का स्नान

​हमारी व्यवस्था की रचनात्मकता देखिए! जब आम आदमी रिश्वत देता है, तो उसे 'पाप' कहा जाता है। लेकिन जब ऋशु श्री जैसे 'महान कलाकार' उप-ठेकेदार (सब-कॉन्ट्रेक्टर) की जादुई छड़ी घुमाते हैं, तो वही काली कमाई रातों-रात 'वैध व्यापारिक भुगतान' (बिजनेस पेमेंट) का पवित्र जल बनकर सामने आती है। फर्ज़ी और बढ़े हुए बिल केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं; वे इस व्यवस्था की आत्मा के वो दस्तावेज़ हैं जो चीख-चीख कर कहते हैं—"तुम मुझे १०% कमीशन दो, मैं तुम्हें सरकारी टेंडर का मोक्ष दूंगा।"

​इस पूरे खेल का सबसे संवेदनशील और भावुक पहलू देखिए। ऋशु श्री केवल पैसे नहीं बटोर रहे थे, वे तो एक अत्यंत संस्कारी 'रिश्ता प्रबंधक' थे। उन्होंने बड़े अफसरों की पत्नियों की शादी की सालगिरह और बच्चों के जन्मदिन की तारीखें बकायदा नोट कर रखी थीं। अब बताइए, जिसे दुनिया 'रिश्वत का जाल' कह रही है, वह वास्तव में 'पारिवारिक स्नेह और सामाजिक सद्भाव' बढ़ाने का कितना निश्छल प्रयास था! अफसरों के घरों में केक कट रहा था और जनता की जेबें कट रही थीं—संतुलन का इससे सुंदर उदाहरण और क्या हो सकता है?

​2. नौकरशाही का 'पर्यटन प्रेम' और फाइलों का विलाप

​इस महायज्ञ में २०१४ बैच की आईएएस अभिलाषा कुमारी शर्मा और २०१७ बैच के योगेश कुमार सागर जैसे 'प्रतिभाशाली' सिविल सेवकों ने भी अपनी आहुति दी। ठेकेदार के खर्चे पर देश-विदेश की यात्राएं करना और विलासिता के समंदर में गोते लगाना—यह सब शायद 'प्रशासनिक संवेदनशीलता' को समझने का एक हिस्सा रहा होगा। अब जब उन पर एफआईआर (FIR) की तलवार लटक रही है, तो फाइलें भी अपनी किस्मत पर रो रही हैं कि काश वे भी किसी ठेकेदार के वीज़ा पर पेरिस घूम आतीं।

​3. १४ वकीलों का 'महायज्ञ' और 'लोकसेवक' होने का भ्रम

​जब यह मामला अदालत की चौखट पर पहुंचा, तो अपनी रक्षा के लिए ऋशु श्री ने १४ भारी-भरकम वकीलों की फौज खड़ी कर दी। तर्क भी ऐसा दिया कि सुनने वाले अपनी हंसी न रोक पाए। दलील दी गई कि "हुजूर, मैं तो कोई लोकसेवक (पब्लिक सर्वेंट) हूँ ही नहीं, मैं तो बस अफसरों का एक अदना सा एजेंट हूँ! इसलिए मुझ पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम लागू ही नहीं होता।" वाह! क्या गजब की दलील है। यानी, अगर आप सीधे डाका डालेंगे तो अपराधी हैं, लेकिन अगर आप केवल डाकुओं के 'मैनेजर' बनकर कमीशन बांट रहे हैं, तो आप तो बस एक सीधे-साधे 'कूरियर बॉय' हुए! अदालत ने हालांकि इस 'दार्शनिक तर्क' को सिरे से खारिज कर दिया और साफ़ कहा कि लोकसेवक न होने का मतलब यह नहीं कि आपको भ्रष्टाचार का 'लाइसेंस' मिल गया है।

​4.  'जीरो टॉलरेंस' का चश्मा और हमारी नियति

​इस पूरे प्रकरण को देखकर यही समझ आता है कि हमारी सरकार का 'जीरो टॉलरेंस' का चश्मा बहुत विशेष है। इसमें केवल छोटे-मोटे बाबुओं की चवन्नी-अठन्नी की रिश्वत ही दिखाई देती है। जब टेंडरों का 'दशमांश' (१०%) सीधे बड़े साहबों के कमरों तक पहुंचता है, तो यह चश्मा अक्सर 'धुंधला' हो जाता है।

​जनता आज भी हाथ में विकास की लालटेन लिए ढूंढ रही है कि 'जीरो टॉलरेंस' किस मोड़ पर खड़ा है? उधर व्यवस्था मुस्कुराकर कह रही है—"टॉलरेंस सचमुच जीरो है, बस उसमें 'कमीशन' के आगे एक जीरो और बढ़ा लीजिए!"

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