बिहार के वित्त रहित शिक्षक: व्यवस्था की क्रूरता और 'खाली खजाने' का छलावा ! प्रो प्रसिद्ध कुमार.
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं - सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों की उदासीनता !
बिहार की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले 'वित्त रहित शिक्षक' आज उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ उन्हें न तो सम्मान मिल रहा है और न ही उनका हक। वर्षों से ज्ञान का दीप जलाने वाले ये शिक्षक स्वयं अंधकारमय भविष्य की ओर धकेले जा रहे हैं। यह उन हजारों परिवारों की चीख है जो व्यवस्था की उपेक्षा की बलि चढ़ रहे हैं।
खजाना खाली है या नीयत में खोट?
सरकार अक्सर यह दलील देती है कि वित्त रहित कर्मियों के लिए 'खजाना खाली' है। लेकिन यह तर्क तब खोखला साबित हो जाता है जब अन्य विभागों और नियमित कर्मचारियों के लिए वेतन, महंगाई भत्ता, समय पर एरियर और तमाम सुख-सुविधाओं के लिए धन की कमी नहीं होती।
क्या वित्त रहित शिक्षक इस राज्य के नागरिक नहीं हैं?
क्या उनके बच्चों को भविष्य देखने का अधिकार नहीं है?
यह भेदभावपूर्ण रवैया सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
"हम भी इंसान हैं... हमारे परिवार हैं... बच्चों का भविष्य है... हमें हमारा हक चाहिए, भीख नहीं!"
यह नारा आज हर उस शिक्षक की जुबान पर है जिसे चुनावी वादों के जाल में फंसाया गया है।
प्रतिनिधियों का विश्वासघात: एमएलसी (MLC) की भूमिका पर सवाल
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनकर आने वाले एमएलसी (MLC), जो स्वयं को शिक्षकों का हितैषी बताते हैं, सत्ता के गलियारों में पहुँचते ही अपनी आवाज खो देते हैं। क्या सत्ता पक्ष के किसी एमएलसी ने कभी यह पूछने की हिम्मत की कि अन्य मदों में पैसे कहाँ से आते हैं? खजाना केवल शिक्षकों के हक के समय ही क्यों खाली होता है? यह उन निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया गया एक बड़ा धोखा है जिन्होंने शिक्षकों के वोटों की सीढ़ी चढ़कर सत्ता सुख भोगा।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: 'समान काम, समान वेतन' और न्याय की उम्मीद
उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया है कि वेतन निर्धारण में मनमानी नहीं की जा सकती। 'समान काम, समान वेतन' के मुद्दे पर न्यायालय ने बार-बार सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने कर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करे।
वित्तीय बाधाओं का बहाना: न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 'Financial constraints' का बहाना बनाकर सरकार अपने कर्मचारियों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं रख सकती।
संवैधानिक दायित्व: बिहार के संदर्भ में भी अदालतों ने फटकार लगाई है कि शिक्षा जैसे मौलिक क्षेत्र में काम करने वालों को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
अब और नहीं सहेगा बिहार!
यह केवल शिक्षकों के वेतन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बिहार की आने वाली पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। एक भूखा और अपमानित शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दे सकता है? यदि सरकार अब भी नहीं जागी, तो यह आक्रोश आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन का रूप लेगा।
समय निकल चुका है, अब जुमलों से काम नहीं चलेगा!
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

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