​डिजिटल महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक पतन: सीबीएसई (CBSE) के ऑन-स्क्रीन मार्किंग संकट का एक विश्लेषण

    


शिक्षा और नीति ब्लॉग  -प्रो प्रसिद्ध कुमार.


​हाल ही में घोषित सीबीएसई कक्षा 12 के परिणामों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। नए सिरे से लागू की गई 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) प्रणाली, जिसे मूल्यांकन में पारदर्शिता और तेजी लाने के लिए लाया गया था, वह आज छात्रों के असंतोष, अंकों में भारी विसंगतियों और प्रशासनिक विफलता का मुख्य कारण बन चुकी है। यह ब्लॉग इस पूरे संकट का एक निष्पक्ष और विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

​1. संकट की पृष्ठभूमि: डिजिटल सुधार या जल्दबाजी का शिकार?

​सीबीएसई द्वारा इस वर्ष शुरू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली का मुख्य उद्देश्य मानवीय त्रुटियों (जैसे योग की गलतियां) को समाप्त करना, त्वरित मूल्यांकन सुनिश्चित करना और भौतिक कॉपियों के रख-रखाव से मुक्ति पाना था। सैद्धांतिक रूप से, इस प्रणाली के तहत हस्तलिखित उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल रूप से स्कैन करके एक सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है, जहाँ शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर उनका मूल्यांकन करते हैं।

​हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत रही। जैसे ही कक्षा 12 के परिणाम घोषित हुए, पूरे देश में छात्रों के बीच हड़कंप मच गया। पिछले वर्ष की तुलना में उत्तीर्ण प्रतिशत 88.39% से गिरकर 85.29% पर आ गया और 90% से अधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। जब निराश छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियों की मांग की, तो व्यवस्था की कलई पूरी तरह खुल गई।

​मुख्य विफलताएं और छात्रों की शिकायतें:

​धुंधली और अधूरी प्रत्तियां: छात्रों को जो स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएं मिलीं, उनमें कई पन्ने धुंधले थे, कुछ पन्ने पूरी तरह गायब थे, और कई महत्वपूर्ण उत्तरों को बिना जांचे (Unmarked) ही छोड़ दिया गया था।

​डेटा और गोपनीयता का उल्लंघन: घोर लापरवाही का आलम यह था कि कई छात्रों को उनके बजाय किसी अन्य छात्र की उत्तर पुस्तिकाएं भेज दी गईं, जो सीधे तौर पर गोपनीयता का घोर उल्लंघन है।

​पोर्टल का क्रैश होना: जब 4 लाख से अधिक छात्रों ने अपनी कॉपियों के सत्यापन के लिए आवेदन किया, तो भारी ट्रैफिक के कारण सीबीएसई का री-इवैल्युएशन पोर्टल पूरी तरह क्रैश हो गया।

​2. प्रशासनिक विफलता और नीतिगत खामियां 

​इस पूरे संकट का बारीकी से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल तकनीक की विफलता नहीं, बल्कि एक गंभीर नीतिगत और प्रशासनिक विफलता है। इसके निम्नलिखित तीन मुख्य स्तंभ हैं:

​क. अपर्याप्त पायलट परीक्षण और बुनियादी ढांचे की कमी

​सीबीएसई ने इससे पहले 2013-14 में छोटे पैमाने पर ओएसएम (OSM) का प्रयास किया था, जो डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण विफल रहा था। इसके बाद, बोर्ड की अपनी गवर्निंग बॉडी ने सिफारिश की थी कि सत्र 2024-25 में केवल कुछ कम-छात्रों वाले विषयों पर इसका परीक्षण (Pilot Test) किया जाए। लेकिन बोर्ड ने इन चेतावनियों को दरकिनार करते हुए, बिना किसी ठोस तैयारी के 2026 में सभी विषयों के लिए इसे पूर्ण रूप से लागू कर दिया। सीबीएसई के 33,000 संबद्ध स्कूलों में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के वे स्कूल भी शामिल हैं, जहाँ न तो पर्याप्त डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ही शिक्षकों को इसके लिए तैयार किया गया था।

​ख. शिक्षकों के प्रशिक्षण और समय की अनदेखी

​कक्षा 12 की पहली बोर्ड परीक्षा 17 फरवरी को थी, और शिक्षकों को ओएसएम कार्यान्वयन की सूचना इसके मात्र 10 दिन पहले दी गई। शिक्षक पहले से ही स्कूलों में परीक्षाओं और बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) जैसे चुनावी कर्तव्यों में व्यस्त थे। उन्हें पोर्टल के यूजर इंटरफेस को समझने, स्क्रॉल करने, मार्क करने और री-चेक करने का अभ्यास करने का समय ही नहीं मिला। परिणामस्वरूप, 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं (लगभग 40 करोड़ पृष्ठों) को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के हड़बड़ी में जांचा गया।

​ग. वेंडर चयन और निविदा प्रक्रिया पर गंभीर आरोप

​इस संकट ने तब राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले लिया जब विपक्षी नेताओं और खोजी ब्लॉगर्स (जैसे कक्षा 12 के छात्र सार्थक सिद्धांत) ने इस कार्य के लिए अनुबंधित फर्म 'COEMPT Eduteck' के चयन पर सवाल उठाए। आरोपों के अनुसार, निविदा (Tendering) प्रक्रिया में वित्तीय मानदंडों को जानबूझकर शिथिल किया गया, सुरक्षा प्रमाणपत्रों की शर्तों को छोड़ दिया गया, और ब्लैकलिस्टिंग के नियमों में बदलाव किए गए। यहाँ तक कि अनिवार्य CERT-In सुरक्षा ऑडिट को भी दरकिनार कर दिया गया, जिससे लाखों छात्रों का संवेदनशील डेटा और उनका भविष्य दांव पर लग गया।

​3. बोर्ड की तात्कालिक प्रतिक्रिया: सुधारात्मक या केवल जनसंपर्क (PR)?

​संकट के गहराने और संसदीय स्थायी समिति द्वारा तलब किए जाने के बाद, सीबीएसई ने रक्षात्मक रुख अपनाया है। बोर्ड ने कॉपियों के आवेदन की समय-सीमा बढ़ाई है और आईआईटी मद्रास तथा कानपुर के विशेषज्ञों को तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए शामिल किया है।

​हालांकि, दूसरी ओर बोर्ड ने स्कूल प्राचार्यों को सोशल मीडिया पर सीबीएसई के पक्ष में 'रील्स' और सकारात्मक संदेश पोस्ट करने के निर्देश दिए हैं। इसे इस गंभीर मुद्दे के समाधान के बजाय केवल जनसंपर्क (PR Exercise) के जरिए छवि चमकाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जो कि अत्यंत खेदजनक है।


​शिक्षा व्यवस्था में तकनीकी सुधारों का स्वागत होना चाहिए, लेकिन जब तकनीक का क्रियान्वयन बिना दूरदर्शिता, बिना आवश्यक प्रशिक्षण और संदिग्ध पारदर्शिता के साथ किया जाता है, तो वह सुधार नहीं बल्कि 'उत्पीड़न' बन जाता है। सीबीएसई का यह ओएसएम संकट देश के करोड़ों छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके करियर के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।

​सुझाव: बोर्ड को तुरंत इस मामले में एक स्वतंत्र न्यायिक या उच्च स्तरीय तकनीकी जांच करानी चाहिए। भविष्य के लिए, किसी भी बड़े बदलाव को थोपने के बजाय, पहले शिक्षकों का व्यापक प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए, मजबूत सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो, और निविदा प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए। शिक्षा बोर्ड की प्राथमिकता अपनी छवि बचाना नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य और मूल्यांकन की शुचिता की रक्षा करना होना चाहिए। 

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