आदिवासी पहचान और आस्था पर बहुसंख्यकवाद का साया!

   


​जल, जंगल और जमीन की लूट कर सरकार पूंजीपतियों को चारागाह बना रही है.


​हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में 'जनजाति सुरक्षा मंच' और संघ परिवार से जुड़े संगठनों द्वारा एक विशाल 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' का आयोजन किया गया। महान आदिवासी नायक वीर बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में सरकार और प्रशासन की पूरी मशीनरी शामिल थी, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस मंच से जो मांगें उठाई गईं, वे केवल सांस्कृतिक नहीं थीं, बल्कि उनके पीछे एक गहरा राजनीतिक एजेंडा छिपा हुआ था।

​इस समागम का मुख्य उद्देश्य उन आदिवासियों को 'अनुसूचित जनजाति' (ST) की सूची से बाहर करने की मांग करना था, जिन्होंने ईसाई या अन्य धर्म अपना लिया है। साथ ही, उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को छीनने की वकालत भी की गई।

​संवैधानिक मर्यादा और ऐतिहासिक मिसाल

​धर्म परिवर्तन के आधार पर आदिवासियों को आरक्षण और अन्य कानूनी लाभों से वंचित करने की मांग पूरी तरह से असंवैधानिक है। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के निर्धारण के लिए अलग-अलग मानदंड तय किए गए हैं। 1950 के राष्ट्रपति आदेश के तहत अनुसूचित जातियों के लिए हिंदू (या बौद्ध/सिख) धर्म से जुड़े होने की अनिवार्यता है, लेकिन आदिवासियों (ST) के मामले में धर्म की ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।

​ऐतिहासिक रूप से, आदिवासियों की पहचान उनकी विशिष्ट जीवन शैली, सामाजिक ताने-बाने, संस्कृति और भौगोलिक अलगाव पर आधारित है, न कि किसी संगठित धर्म पर। पटना उच्च न्यायालय ने 1963 में 'कार्तिक उरांव' के ऐतिहासिक मामले में यह स्पष्ट कर दिया था कि:

​"आदिवासी पहचान का आधार सामाजिक और सामुदायिक संबंध हैं, न कि धार्मिक आस्था। एक उरांव हमेशा उरांव ही रहता है, चाहे वह हिंदू हो, ईसाई हो या बौद्ध।"

​वर्तमान में इस कानूनी मिसाल को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो कि आदिवासियों की मूल पहचान पर हमला है।

​सांस्कृतिक सह-वियोजन की राजनीति

​वर्तमान बहुसंख्यकवादी राजनीति आदिवासियों की अनूठी पहचान को समाप्त कर उन्हें 'सनातन परिवार' या हिंदू समाज के एक हिस्से के रूप में समाहित करने का प्रयास कर रही है। आदिवासियों को 'आदिवासी' (मूल निवासी) के बजाय 'वनवासी' (वनों में रहने वाले) कहकर संबोधित किया जा रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक संप्रभुता को कमतर करता है।

​ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक आदिवासी देवताओं का हिंदूकरण किया जा रहा है, और वहां हनुमान मूर्तियों या मंदिरों की स्थापना की जा रही है। भारत का संविधान (अनुच्छेद 25) प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। एक आदिवासी राम की पूजा करे या ईसा मसीह की, इससे उसकी आदिवासी पहचान पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि केवल राम की पूजा करने वाला ही अपनी आदिवासी संस्कृति के प्रति वफादार है, और ईसाई आस्था रखने वाला गद्दार।

​आदिवासी समाज के वास्तविक और ज्वलंत संकट

​राजनीतिक लाभ के लिए धर्म के नाम पर आदिवासी समाज को आपस में लड़ाने के बीच, उनके बुनियादी और वास्तविक अधिकारों की घोर अनदेखी की जा रही है:

​जल, जंगल और जमीन की लूट: एक तरफ भाषणों में 'सनातन' संस्कृति को प्रकृति पूजक बताया जाता है, तो दूसरी तरफ ओडिशा और छत्तीसगढ़ (जैसे हसदेव अरण्य) में कॉरपोरेट खनन के लिए आदिवासियों के पवित्र जंगलों और पहाड़ों को उजाड़ा जा रहा है। ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं।

​कानूनी अधिकारों का हनन: वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लगातार कमजोर किया जा रहा है और पेसा (PESA) कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों की अवहेलना हो रही है।

​बुनियादी सुविधाओं का अभाव: आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बुनियादी नागरिक व स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। आदिवासी छात्र छात्रावासों की दयनीय स्थिति, छात्रवृत्ति मिलने में देरी और सरकारी नौकरियों में आरक्षित पदों के बैकलॉग को भरने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 

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