सुर्खियां जापान की, व्यथा बिहार की: क्या यही है पत्रकारिता का बदलता स्वरूप?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसकी पहली जिम्मेदारी अपने पाठकों तक सटीक और स्पष्ट जानकारी पहुँचाना है। परंतु, आज ही 'प्रभात खबर' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख ने इस स्तंभ की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। जब शीर्षक और खबर के बीच का तालमेल पूरी तरह गायब हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि संपादन डेस्क अब 'आंखें बंद कर' काम कर रहा है।
शीर्षक और कथ्य का विरोधाभास
लेख का शीर्षक चिल्ला-चिल्ला कर 'जापानियों की औसत उम्र सबसे अधिक' होने का दावा कर रहा है, जबकि उसके नीचे की इबारत बिहार के 1799 पुलिस अवर निरीक्षक भर्ती परीक्षा के अभ्यर्थियों का दर्द बयां कर रही है। यह महज एक "टाइपिंग एरर" नहीं है, बल्कि यह समाचार पत्रों के गिरते मानक और संपादन की प्रक्रिया में आई भारी शिथिलता का प्रमाण है।
पाठकों के साथ कैसा खिलवाड़?
एक पाठक अखबार इसलिए उठाता है ताकि वह कम समय में देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों से रूबरू हो सके।
भ्रामक सूचना: अभ्यर्थी जो अपनी परीक्षा के नतीजों और धांधली की खबर पढ़ना चाहते हैं, वे शीर्षक देखकर इसे नजरअंदाज कर सकते हैं।
विश्वास का संकट: जब किसी संस्थान में इतने गंभीर विषय (भर्ती धांधली) पर रिपोर्ट प्रकाशित हो रही हो, तो वहां शीर्षक चयन में इतनी बड़ी लापरवाही उस खबर की गंभीरता को ही खत्म कर देती है।
संपादन डेस्क की जवाबदेही कहाँ है?
खबरों को अंतिम रूप देने से पहले उसे कई चरणों (Sub-editor, News Editor) से गुजरना पड़ता है। क्या किसी की भी नजर इस विसंगति पर नहीं पड़ी? क्या आज की पत्रकारिता केवल 'कॉपी-पेस्ट' और 'स्पेस भरने' तक सीमित रह गई है? पुलिस भर्ती में पारदर्शिता की मांग करने वाला लेख खुद अपनी प्रस्तुति में अपारदर्शी और त्रुटिपूर्ण है।

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