प्रवासी श्रमिक: नीतिगत वादे और कड़वी जमीनी हकीकत!
कोविड-19 लॉकडाउन के छह साल बाद भी भारत में प्रवासी श्रमिकों की दयनीय स्थिति है।
असंतोष की वापसी: गुड़गांव और नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में श्रमिकों का हालिया विरोध प्रदर्शन यह दर्शाता है कि उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। न्यूनतम मजदूरी में ठहराव, काम के खराब हालात और बढ़ती महंगाई (विशेषकर पश्चिम एशिया युद्ध के कारण एलपीजी की कीमतों में उछाल) इस असंतोष के मुख्य कारण हैं।
प्रशासनिक देरी: हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में न्यूनतम मजदूरी का संशोधन लगभग एक दशक की देरी से किया गया है, जो बढ़ती जीवन लागत के सामने अपर्याप्त है।
डिजिटल पंजीकरण बनाम आर्थिक सुरक्षा: 'ई-श्रम पोर्टल' के माध्यम से 31.4 करोड़ से अधिक श्रमिकों का पंजीकरण तो हुआ है, लेकिन डेटा बताता है कि 94% श्रमिक प्रति माह ₹10,000 से कम कमाते हैं। इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों से हैं, जिनके लिए शहरी क्षेत्रों में गरिमापूर्ण जीवन और वित्तीय सुरक्षा अभी भी एक सपना है।
विफल योजनाएं: 'अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स' (ARHC) जैसी आवास योजनाएं और 'कल्याण पोर्टेबिलिटी' जमीन पर प्रभावी नहीं हो पाई हैं। घरों की गुणवत्ता खराब है या वे कार्यस्थलों से बहुत दूर हैं।
नए श्रम कानून और जोखिम: नए श्रम कोड्स के लागू होने से श्रमिक चिंतित हैं। उन्हें डर है कि इससे काम के घंटे बढ़ेंगे और ओवरटाइम सुरक्षा कम होगी। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में मानसून की अनिश्चितता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बदलते स्वरूप उनकी चुनौतियों को बढ़ा रहे हैं।
सरकार ने डिजिटल डेटाबेस और कुछ नई योजनाएं तो बनाई हैं, लेकिन श्रमिक आज भी "महंगे शहर और संकटग्रस्त गांव" के बीच फंसे हुए हैं। जब तक उनकी आय में वास्तविक वृद्धि और कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, उनकी बदहाली का 'वायरस' खत्म नहीं होगा।
डिजिटल पहचान तो मिल गई है, लेकिन वास्तविक अधिकार और सामाजिक सुरक्षा अब भी कोसों दूर है।

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