ट्रंप का 'आर्ट ऑफ द रिट्रीट' और मध्य-पूर्व का बदलता समीकरण!
हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने विश्व मंच पर अमेरिका की साख और उसकी कूटनीतिक सीमाओं को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। जिसे कभी एक 'निर्णायक सैन्य अभियान' के रूप में प्रचारित किया गया था, वह अंततः एक अस्थायी युद्धविराम और रणनीतिक वापसी में तब्दील होता दिख रहा है। इसे आलोचक ट्रंप की 'आर्ट ऑफ द डील' के बजाय 'आर्ट ऑफ द रिट्रीट' का नाम दे रहे हैं।
सैन्य दबाव बनाम जमीनी हकीकत
अमेरिका ने ईरान के प्रति कड़े तेवर अपनाते हुए परमाणु कार्यक्रमों को ध्वस्त करने और शासन परिवर्तन जैसे बड़े लक्ष्य निर्धारित किए थे। लेकिन हफ्तों की बमबारी के बाद भी ईरान की मिसाइल क्षमताएं और उसका परमाणु भंडार काफी हद तक सुरक्षित है। यहाँ तक कि 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज', जिसे बंद करने की धमकी दी गई थी, अब एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर 'फिर से खोलने' की बात कही जा रही है, जबकि वास्तव में वह कभी पूरी तरह बंद हुआ ही नहीं था।
मध्यस्थों की नई भूमिका: पाकिस्तान और चीन
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प मोड़ पाकिस्तान की भूमिका रहा। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी नेतृत्व ने अमेरिका और ईरान के बीच एक 'ब्रिज' का काम किया। जहाँ एक समय ट्रंप ने पाकिस्तान की आलोचना की थी, वहीं अब वे शांति के लिए उसी के सहयोग की सराहना कर रहे हैं।
इसके साथ ही, पर्दे के पीछे चीन की कूटनीति ने भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। बीजिंग की इस शांति प्रक्रिया में बढ़ती दिलचस्पी यह दर्शाती है कि मध्य-पूर्व के समीकरणों में अब केवल वाशिंगटन का ही दबदबा नहीं रहा।
अमेरिका की साख पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति अमेरिका के लिए 'वियतनाम के बाद की सबसे बड़ी रणनीतिक क्षति' साबित हो सकती है। यूरोपीय सहयोगियों का समर्थन न मिलना और सैन्य लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी सैन्य शक्ति के डर को कम किया है।
इजरायल की स्थिति: युद्धविराम की खबरों के बीच इजरायल स्वयं को अलग-थलग महसूस कर रहा है, क्योंकि उसे इस पूरी प्रक्रिया में केवल अंतिम समय पर सूचित किया गया।
घरेलू राजनीति: ट्रंप इस युद्धविराम को एक 'बड़ी जीत' के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह एक बड़ी सैन्य विफलता से बचने की कोशिश ज्यादा लगती है।
ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्प उम्मीद के मुताबिक कारगर नहीं रहा। बलपूर्वक आज्ञापालन (Coercion) के बजाय अब समझौते की मेज ही एकमात्र रास्ता बची है। यह घटनाक्रम सिद्ध करता है कि आज की दुनिया में केवल सैन्य शक्ति के दम पर राजनीतिक उद्देश्य हासिल करना संभव नहीं है; इसके लिए बहुपक्षीय कूटनीति और जमीनी हकीकत को स्वीकार करना अनिवार्य है।

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