दुर्लभ मृदा तत्व : चीन पर निर्भरता और भविष्य की चुनौतियाँ !

   


​चीन का एकाधिकार: यद्यपि 'दुर्लभ मृदा' तत्व दुनिया के कई हिस्सों (भारत, ब्राजील, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) में पाए जाते हैं, लेकिन चीन वर्तमान में इनके खनन का 70% और शोधन  का लगभग 90% नियंत्रित करता है।

​रणनीतिक महत्व: लिथियम, कोबाल्ट, डिस्प्रोसिम और सीरियम जैसे तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरों, सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च-तकनीकी विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं। पश्चिमी देशों की इन पर बढ़ती निर्भरता ने उन्हें भू-राजनीतिक रूप से असुरक्षित  बना दिया है।

​आउटसोर्सिंग और 'NIMBY' प्रभाव: पश्चिमी देशों ने पर्यावरण प्रदूषण और उच्च लागत के डर से इन तत्वों के निष्कर्षण को उन देशों में आउटसोर्स कर दिया जहाँ नियम शिथिल हैं। इस मेरे घर के पीछे नहीं  वाली सोच ने चीन को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर दिया।

​भविष्य की राह:  यूरोप और अन्य देशों को अपनी पुरानी उदासीनता छोड़नी होगी। यूरोप के पास रीसाइक्लिंग तकनीकों और पेटेंट में बढ़त हासिल है, जिसका उपयोग करके वह अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित कर सकता है और चीन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है।

​ यदि दुनिया को अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करना है और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी है, तो दुर्लभ खनिजों के खनन और शोधन के लिए चीन के विकल्प तलाशना अब अनिवार्य हो गया है।

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