ऊर्जा का 'हथियारीकरण' (Weaponization of Energy) !
आधुनिक युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं पर लड़े जाते हैं। संसाधन उपलब्ध होना काफी नहीं है, बल्कि उन तक 'पहुंच' बनाए रखना असली शक्ति है। भारत के लिए यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता का विषय है।
'हॉर्मुज जाल' और रणनीतिक स्वायत्तता:
भारत एक कठिन संतुलन बना रहा है। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बचाना है, तो दूसरी तरफ रूस और ईरान जैसे 'प्रतिबंधित' देशों से ऊर्जा खरीदनी है। भारत को किसी एक पक्ष में झुकने के बजाय अपनी 'डी-रिस्किंग' रणनीति खुद विकसित करनी होगी।
घरेलू तकनीक की उपेक्षा:
महत्वपूर्ण बिंदु 'कोयला गैसीकरण' है। भारत के पास विशाल कोयला भंडार है, लेकिन तकनीक और नीतिगत स्पष्टता के अभाव में हम अब भी आयातित गैस और तेल पर निर्भर हैं। चीन ने जिस तरह सासोल (Sasol) जैसी कंपनियों से तकनीक सीखकर खुद को आत्मनिर्भर बनाया, वह भारत के लिए एक सबक है।
भविष्य की राह:
भारत को केवल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों (जैसे चाबहार या अन्य द्विपक्षीय समझौते) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी आंतरिक ऊर्जा उत्पादन क्षमता को युद्ध स्तर पर बढ़ाना चाहिए। 'प्रेस नोट ३' जैसे नियमों में ढील और घरेलू गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
जब तक भारत अपनी ऊर्जा नीति को शुद्ध अर्थशास्त्र के चश्मे से हटाकर वैश्विक भू-राजनीति के नजरिए से नहीं देखेगा, तब तक वह बाहरी संकटों के प्रति संवेदनशील बना रहेगा। ऊर्जा सुरक्षा का रास्ता खाड़ी के देशों की कूटनीति और भारत के घरेलू कोयला खदानों से होकर गुजरता है।

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