​हंगरी का चुनाव: लोकतंत्र की वापसी और तानाशाही का अंत!

   


​यह  हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन की 16 साल पुरानी सत्ता के पतन और उनके उत्तराधिकारी पीटर मग्यार की जीत का विश्लेषण है। यह चुनाव न केवल हंगरी के लिए, बल्कि वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। 

​चुनावी निरंकुशता का अंत: हंगरी के मतदाताओं ने इस भ्रम को तोड़ दिया है कि 'अनुदार लोकतंत्र' (Illiberal Democracy) को चुनाव के जरिए नहीं हटाया जा सकता। यह जीत उन देशों के लिए एक मिसाल है जहाँ सत्ता को अजेय मान लिया जाता है।

​लोकतांत्रिक लचीलापन: यह परिणाम उन दावों को खारिज करता है कि उदार लोकतंत्र अब अप्रासंगिक हो गया है। जनता ने साबित किया है कि बहुमत के आधार पर तानाशाही थोपने वाले शासन के खिलाफ बदलाव की इच्छा एक स्वाभाविक मानवीय प्रेरणा है।

​यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: ओर्बन ने चुनाव को अपने और जेलेंस्की के बीच के मुकाबले के रूप में पेश किया था। मतदाताओं ने ओर्बन के 'रूसी समर्थक' रुख और आर्थिक संकट के लिए यूक्रेन की मदद को दोष देने वाली थ्योरी को नकार दिया।

​भ्रष्टाचार और विदेशी प्रभाव:  जनता ने ओर्बन के 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (सांठगांठ वाली पूंजीवाद) और रूस-चीन के साथ उनके विवादास्पद संबंधों को पहचान लिया था। विशेष रूप से चीन के साथ $1.8 बिलियन के विश्वविद्यालय प्रोजेक्ट की भारी लागत ने जनता में असंतोष पैदा किया।

​वैश्विक गठबंधन की हार: ओर्बन को डोनाल्ड ट्रंप, जे.डी. वेंस, बेंजामिन नेतन्याहू और व्लादिमीर पुतिन जैसे नेताओं का वैचारिक समर्थन प्राप्त था। उनकी हार इन दक्षिणपंथी और अनुदार ताकतों के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है। 

​हंगरी का यह चुनाव संदेश देता है कि "पश्चिम बनाम शेष विश्व" के पुराने नक्शे अब प्रासंगिक नहीं हैं। यह लड़ाई वास्तव में लोकतंत्र बनाम निरंकुशता के बीच है। हंगरी के नागरिकों ने न केवल एक राष्ट्रीय तानाशाह को हराया है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय अनुदार गठबंधन को भी चुनौती दी है।

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