सामूहिक स्वर और कला की शक्ति: पांजरी आर्टिस्ट्स यूनियन (PAU) !

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​कला जब केवल प्रदर्शन न रहकर सामाजिक संवाद का जरिया बन जाए, तो वह समाज की गहरी परतों को झकझोरने की क्षमता रखती है। बंगाल स्थित पांजरी आर्टिस्ट्स यूनियन (PAU) इसी विचार को केंद्र में रखकर काम कर रहा है। यह कलाकारों का एक ऐसा समूह है जो राजनीति, समाज और हाशिए के समुदायों की कहानियों को प्रदर्शन कला (performance art) के माध्यम से मंच प्रदान करता है।

​कला और सामाजिक सरोकार

​21 फरवरी 2022 को गठित इस यूनियन में दृश्य कला, डिजाइन, साहित्य, फिल्म और शिक्षा जगत से जुड़े 14 अभ्यासी शामिल हैं। 'पांजरी' नाम उन पारंपरिक औजारों से प्रेरित है जिनका उपयोग बंगाल के नाविक जलमार्गों पर नेविगेशन के लिए करते थे। यह नाम इस बात का प्रतीक है कि यह समूह कला के जरिए समाज को दिशा दिखाने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रयास कर रहा है।

​प्रमुख प्रदर्शन और उनकी प्रासंगिकता

PAU के काम में 'परफॉर्मेटिविटी' (प्रदर्शनशीलता) केवल एक कला रूप नहीं, बल्कि एकजुट होने और अपनी बात रखने का एक माध्यम है।

​ट्राई टू रिमेंबर (Try to Remember): इस प्रदर्शन के जरिए कलाकारों ने जाति, हाशिए पर रहने के दर्द और राजनीतिक प्रतिरोध जैसे जटिल विषयों को छुआ है। कोच्चि के 'कोइर गोडाउन' में प्रदर्शन के दौरान कलाकारों ने प्रतीकात्मक रूप से एक अर्थी को सिर पर उठाकर प्रदर्शन किया, जो श्रम, यादों और धार्मिक पहचान के संघर्ष को दर्शाता है।

​सूतपुत्र बोध नाट (Sutaputra Bodh Naat): असम के 'भाउना' कलाकारों के सहयोग से तैयार यह कृति पारंपरिक महाकाव्यों के वैकल्पिक पाठ प्रस्तुत करती है, जिसमें गैर-ब्राह्मणवादी आवाजों को प्रमुखता दी गई है।

​विभाजन और विस्थापन: कलाकारों ने पश्चिम बंगाल और असम के साझा सांस्कृतिक इतिहास, विभाजन की विभीषिका और सीमावर्ती क्षेत्रों के अनुभवों को अपनी कृतियों में जीवंत किया है।

​संवाद: कला का असली उद्देश्य

​PAU के सदस्यों—पिनाक बनिक, अंजलि, समप्रिया मंडल और भास्कर हजारिका—का मानना है कि कला का उद्देश्य दर्शकों को केवल मंत्रमुग्ध करना नहीं, बल्कि उन्हें बातचीत के लिए प्रेरित करना है।

​"प्रदर्शन एक ऐसा मंच है जो जीवित अनुभवों के गहन आदान-प्रदान का अवसर प्रदान करता है। यह महत्वपूर्ण है कि हम रूढ़िवादी धारणाओं से ऊपर उठकर उन कहानियों को सामने लाएँ जो अक्सर दबा दी जाती हैं।"

​पांजरी आर्टिस्ट्स यूनियन का कार्य यह सिद्ध करता है कि कला जब 'व्हाइट क्यूब' गैलरी की दीवारों से बाहर निकलकर सीधे समुदाय के बीच पहुँचती है, तो वह अधिक प्रभावी और सामाजिक रूप से प्रभावशाली बन जाती है। यह समूह न केवल कलात्मक प्रयोग कर रहा है, बल्कि भाषा, पहचान और सीमा के पार मानवीय संवेदनाओं को जोड़ने का एक सेतु भी बन गया है। 

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